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  • Bhojpuri में पढ़ें भोजपुरियत के रंग में रंगाइल राहुल बाबा: घुमक्कड़ी सुभाव वाला राहुल बाबा जहवां-जहवां गइल रहनीं, उहवां के भासा में महारत हासिल कऽ लेले रहनीं।अंगरेजीराज में अंगरेजी पर उहांके दबदबा रहे। रूस में गइनीं त रूसी में विद्वता हो गइल। चीन आ तिब्बत में जाके चीनी आ तिब्बती प अधिकार कऽ लिहनीं। अपना देश में त संस्कृत,हिन्दी, पाली,प्राकृत, अपभ्रंश, बांग्ला, अरबी, फारसी वगैरह ना जाने कतने बोली-भासा के उहांके गम्हीर अध्येता रहनीं। बाकिर एह सभके बावजूद भोजपुरी आ भोजपुरियत में राहुल बाबा के जान-परान बसत रहे। एही कारन से जवना साल भारत के आजादी मिलल,ओही साल दिसंबर,1947 में आयोजित अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के दोसरका अधिवेशन में महापंडित राहुल सांकृत्यायन के सभापतित्व के सम्मान दियाइल आ अपना अध्यक्षीय भासन में उहांके ऐलान कइले रहनीं-“अबहिन हमनी के ई मतारी भाखा के केहू ना पूछत आछत बा,लेकिन कतेक दिनवा हो कतेक दिनवा? हमनी के देस के दिन लौटल। लोग सचेत भइल। ऊहो दिनवा आई जब हमनी के भाखा सरताज बनी।” आपन भाषा साहित्य-संस्कृति के स्तर पर सरताज त बनल,मगर सियासी लोग सचेत ना भइल,तबे नू आजुओ संविधान में आठवीं अनुसूची में शामिल होखे खातिर लमहर समय से संघर्ष जारी बा। राहुल जी कतना बड़हन दूरद्रष्टा रहनीं, एकर अंदाज एही से लगावल जा सकेला कि अपना ओह ऐतिहासिक भासन में पंचायती राज बेवस्था लागू करे आ पढ़ाई के माध्यम मातृभाषा के बनावे प जोर देले रहनीं। ओह घरी ले भिखारी ठाकुर के लोग नचनिया बूझत रहे आ उन्हुका नाटकन के कीमत ना समुझल जात रहे। भासन में उहांके भोजपुरिया दमखम के पर्याय बतवले रहनीं भिखारी ठाकुर के आ ‘अनगढ़ हीरा’ के खिताब देत कहले रहनीं- “हमनी के बोली में केतना जोर हवा,केतना तेज बा,ई अपने सब भिखारी ठाकुर के नाटक में देखीले।लोग के काहें नीमन लागेला भिखारी ठाकुर के नाटक? काहें दस-दस पनरह-पनरह हजार के भीड़ होला इ नाटक देखे खातिर? मालूम होत बा कि एही नाटक में पवलिक के रस आवेला। जवना चीज में रस आवे उहे कविताई। केहू के जो लमहर नाक होय आ ऊ खाली दोसे सूंघत फिरे त ओकरा खातिर का कहल जाय! हम ई ना कहतानी जे भिखारी ठाकुर के नाटकन में दोस नइखे। दोस बा त ओकर कारन भिखारी ठाकुर नइखन,ओकर कारन हवे पढ़ुवा लोग– भिखारी ठाकुर हमनी के एगो अनगढ़ हीरा हवे। उनकरा में कुलि गुन बा,खाली एने ओने तनी तूनी छांटे के काम हवे।” उत्तर प्रदेश में आजमगढ़ जिला के पंदाहा गांव में नौ अप्रैल, 1893 के जनमल राहुल जी बिहार में सारन जिला के परसा मठ में रहिके किसान आंदोलन आ आजादी के लड़ाई लड़त हाजीपुर, हजारीबाग जेहल के सजाइयो भोगनीं, बाकिर मठ होखे भा कारा-जहवां मोका मिलल, उहांके भोजपुरी साहित्य रचल कबो ना भुलइनीं आ आजु ऊ रचना भोजपुरी साहित्य के अनमोल निधि बाड़ी स। उहांके भोजपुरिया नेह-छोह के थाती चिट्ठिओ पतरी अखियान करे जोग बाड़ी स। जब आचार्य महेन्द्र शास्त्री के संपादन में भोजपुरी पत्रिका ‘भोजपुरी’ के प्रकाशन शुरू भइल, त भोजपुरी के महातम का बिसे में लिखल राहुल बाबा के चिट्ठी चरचा में रहल। आगा चलिके बाबू रघुवंश नारायण सिंह फेरु आरा से भोजपुरी पत्रिका ‘भोजपुरी’ के संपादन के सिरीगनेस कइले आ ओमें राहुलजी के ‘भाखा महतारी’ शीर्षक आलेख उहांके मन-मिजाज,सोच के इजहार करत भोजपुरियत के रंग में रंगाइल रहे। महापंडित राहुल सांकृत्यायन भोजपुरिया समाज के औरतन आउर किसानन के दारूण दशा देखिके मर्माहत रहनीं आ एकर खुलासा तब भइल, जब उहांके सन् बयालिस के आंदोलन में हजारीबाग जेहल में बंद रहनीं। जेहले में रहिके उहांके एगो इतिहास रचेवाला नाटक लिखि दिहनीं, जवन ‘मेहरारुन के दुरदसा’ नांव से मशहूर भइल आ आजुओ ओकर प्रासंगिकता जस के तस बरकरार बा। आजु समाज में आ रहल बदलाव आ नारीवादी आंदोलन के पैरोकारी के बावजूद भोजपुरी समाज के पुरुष प्रधान रवैया में कवनो खास परिवर्तन नजर नइखे आवत। इहे कारन बा कि आजुओ राहुल बाबा के ‘मेहरारुन के दुरदसा’ के जहवां मंचन होला, देखनिहारन के आंखि डबडबा आवेले आ नाटक के कथ गहिर संवेदना जगावे बेगर ना रहे। नाटक में जगहा-जगहा अइसन गीत गूथल गइल बाड़न स, जवन देखे-पढ़ेवालन के मंथन करे खातिर मजबूर कऽ देलन स। लरिका-लरिकी में भेद करेवाला समाज के आंखि खोलेवाला गीत के पांती देखीं- एके माई-बपवा से एकही उदरवा से दूनों के जनमवा भइल रे पुरुखवा! पूत के जनमवा में नाच आ सोहर होला बेटी के जनम परे सोग रे पुरुखवा! धनवा धरतिया प बेटवे के हक होला बेटिया के किछऊ ना हक रे पुरुखवा! मरदा के खइला कमइला के रहता बा तिरिया के लागेला केवाड़ रे पुरुखवा! अइसहीं, करजा-रिन लेके खेती करे आ आपन सरबस गंवा देबेवाला किसान के फटेहाली नाटक में आइल एगो गीत में झलकत बा,जवना के भयावहता करेजा कंपा देला- रे फिकिरिया मरलस जान! सांझ-बिहान के खरची नइखे, मेहरी मारे तान अन्न बिना लरिका रोवेला,का करीं हे भगवान! रे फिकिरिया मरलस जान! करजा काढ़िके खेती कइलीं, खेतवे सूखल धान बैल बेंचि जिमदरवा के दिहलीं, सहुआ कहे बेइमान। रे फिकिरिया मरलस जान! राहुल बाबा जब हाजीपुर जेहलखाना में कैद कऽके राखल रहनीं, त उहांके दूगो अउरी मशहूर नाटक-‘नयकी दुनिया’ आ ‘जोंक’ के सिरिजना कइनीं। ‘नयकी दुनिया’ में पुरनकी रूढ़ि आ जाति-बिरादरी के बन्हन तूरिके नवकी दुनिया बनावेके आवाहन कइल गइल रहे। खून चूसेवाला जोंक के प्रतीक बनाके समाज में बेयापल शोसन-दोहन के खिलाफ प्रतिरोध के सुर बुलंद करेवाला नाटक रहे ‘जोंक’,जवना के चार अंक में दौलतमंद सेठ महाजन का संगें साधुओ के नांव प ठगी करेवाला बटमारन के चित्र उकेरल गइल रहे। ‘ढुनमुन नेता’ राहुल बाबा के एगो आउर सब तरह से प्रासंगिक नाटक बा,जवन ओइसन सियासी नेतवन के खबर लेता जे निजी सवारथ लालच वश पार्टी बदलत बा आ बेगर पेनी के लोटा नियर ढुनमुनात रहत बा। दोसरका विश्वयुद्ध का समय रचाइल राहुलजी के चार गो अउरी भोजपुरी नाटक रहलन स,जवन तत्कालीन दुनियावी हालात के तस्वीर खींचत उहांके सोच के गम्हीर उद्घाटन करत रहलन स। ऊ नाटक रहलन स-‘जपनिया राछछ’,’जरमनवा के हार निहचय’,’ई हमार लड़ाई ह’,’देस रछक’। ई नाटक एहू तथ के उजागर करत बाड़न स कि उहांके निगाह खाली अपने देश पर ना,बलुक सउंसे दुनिया के बदलाव पर रहे आ भोजपुरिया समाज के एह बाबत आगाह कइल उहांके एह नाटकन के रचेके मकसद रहे। अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन उहांके मए भोजपुरी नाटकन के ‘भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका’ में छापिके पुस्तकाकारो प्रकाशन कइले रहे। सामाजिक कुरीति,रूढ़ि, अंधविश्वास, जाति-पांति, छुआ-छूत, कठमुल्लापन, ढकोसला, पोंगापंथी जइसन तमाम विषय उहांके रचनाशीलता के जद में रहे आ ओह सबके जरी-सोरी खातमा कऽके एगो सेहतमंद भोजपुरिया समाज के निरमान आदर्श लक्ष्य रहे। महापंडित राहुल सांकृत्यायन के मूलभूत सवाल आजुओ बरकरार बा।जब ले रूढ़िमुक्त समाज के निरमान ना होई,जब ले अबला संपूर्णत: सबला ना बनि जइहें आ जब ले भोजपुरी के आपन हक हासिल ना हो जाई,तब ले राहुल बाबा के सपना अधूरे रही आ जन-मन के कराह ओइसहीं गूंजत रही-रे फिकिरिया मरलस जान—! Source- https://hindi.news18.com/news/bhojpuri-news/rahul-sankrityayan-life-story-read-full-story-in-bhojouri-3731092.html/l

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