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  • हर भाषा के साहित्य में ज्ञान, अनुभव अउर स्थानीय भाषा से समृद्धि: हर भाषा के साहित्य में ज्ञान, अनुभव अउर स्थानीय भाषा से समृद्धि- लोकोक्तियन के प्रचलन लोकव्यवहार के बहुत से उलझल गुथी के सुलझावें में सहायक भी होला. एह संदर्भ में आचार्य चाणक्य के “चाणक्य सूत्र” में वर्णित लोकोक्ति शैली के चर्चा कइल जा सकेला. एह ग्रंथ में लोकोक्ति शैली में कुल 571 सूत्र प्राप्त बा. मसलन “श्व: सहस्रादघ काकिणी श्रेयसी;” मतलब “उधार के हजार से नकद की कौड़ी भली”. पंजाबी भाषा में अइसने एगो कहावत के देशज अर्थ के बारे में देखल जाय. “सिरौं गंजी ते कंघियाँ दा जोड़ा. भोजपुरी भाषा में-“आँख एको नाई कजरौटा नौ ठे”. वइसे ही” गुरु जिना दे टप्पने, चेले जान शड़प्प” भोजपुरी में -“गुरु गुड़ रह गईले अउर चेला चीनी हो गईले”. कहावतन में स्थानीय भाषा के जोर पर कइगो व्यवहारिक अउर नीतिपरक बात कहल गईल बा- जवना के महत्व आजु भी खूब बा. एह कहावतन के एगो अउर महत्व एह नाते भी बा कि भाव आ भाषा दूनो लोकजीवन के एकदम करीब से लिहल गईल बा. बुंदेलखंडी भाषा में अइसने एगो कहावत के बानगी देखल जाय- अक्कल बिन पूत कठैंगर से. बुद्धि बिन बिटिया डैंगुर सी. अब भोजपुरी में ‘कठैंगर ‘के मतलब भईल किवाड़ के पीछे लगावे वाला ‘ओठगन’. अउर ‘डैंगुर’ के मतलब भईल गांव में ‘हरही’ गाय के गला में बांधे वाला ‘लटकन’. एह परतोख के उहे ठीक से समझ सकेला, जे कभी गांव में कवनों ‘बदेल’ गाय के देखले होई. एह ‘लटकन’ के प्रयोग आमतौर पर गाय के गले में बांध दिहल जाला-ताकि ‘हरही गाय’कवनों किसिम के हरहर-पटपट ना कर सकें. भारत में हर तरह के भाषा -बोली के जनपदीय स्तर पर समृद्ध भंडार पहिलके के बुजुर्ग लोगन के लोकचित में मौजूद रहल. मुखामुखी विद्या से अपने ज्ञान-अनुभव के एक पीढ़ी से दूसरा पीढ़ी तक पहुँचावें के दायित्व भी एह बुजुर्गन पर रहल.एकर संग्रह भी लोकसाहित्य के विद्वान डॉक्टर कृष्णदेव उपाध्याय जी अपना दुगो संग्रह “भोजपुरी ग्रामगीत” अउरी “भोजपुरी लोकसंस्कृति”नामक ग्रंथ में कइलें बानीं. पर लोकगीतन के संग्रह के शरुआत के असली श्रेय रामनरेश त्रिपाठी जी के ही दिहल जा सकेला. ऊहां के रचित “कविता कौमदी” एह विधा के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण मानल जा सकेला. भारत में भाषा के विविधवर्णी रूप के संकेत ‘अथर्ववेद’ में भी प्राप्त बा. ‘अथर्ववेद’ के ‘पृथ्वी सूक्त’ में कहल गईल बा- जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम्. (यह पृथ्वी नाना धर्मों के अनुयायी, अनेक भाषाओं के बोलने वाले, बहुत से मनुष्यों को धारण करती है.) एह वजह से हर जनपदीय भाषा के कोष में अनुभव, ज्ञान अउर नीति पर आधारित लोकक्तियां-कहावतों अउर बुझवल के समृद्ध भंडार मौजूद बा. एह बुझवल के एगो नजीर देखि- दुई मुँह छोट एक मुँह बड़ा. आधा मनई लीले खड़ा.. एकर सीधा मतलब ‘पैजामा’ होला. बाकि कहें के अंदाज देखल जाय-तब ओह पैमाना पर ग्रामीण बुद्धि के चमत्कार के पता चली जाई. वइसे ही भारत मे प्राचीन काल से समुद्री व्यापार खूब फलल -फूलल रहल. व्यापारी-व्यापार वास्ते दूर तक समुद्रीय यात्रा करत रहलन. गुजराती में अइसने एगो कहावत में बतावल गईल बा कि- प्राचीन काल में काहें कवनों गुजराती व्यापारी ‘जावा’ देश के यात्रा करें त ऊहवें बसी जाय. चाहें लौटें त अतना समृद्ध होकर लौटें कि पीढ़ी दर पीढ़ी आराम से रहीं सकें. जो जाए जावे, ते पाछे नहिं आवे. ने जो आवे तो परिया-परिया मोती लावे.. एह व्यापरियन के जरिये ही भारत के समृद्ध सभ्यता-संस्कृति सबसे पहिले दक्षिण पूर्व एशिया अउर दुनिया के कई देशन में पहुँचल. भारत के सभ्यता-संस्कृति के प्रचार- प्रसार कभी तलवार के जोर पर ना पहुंचल रहें. अहिंसक अउर शांतिपूर्ण तरीके से ईमानदारी अउर साहस के बल पर ही भारत के सभ्यता-संस्कृति के प्रचार-प्रसार दुनिया भर में फैलल. एकरा विपरीत ‘इस्लामिक कल्चर’ के बारे में जब पश्चिम के इतिहासकार प्रचार करें लगलन कि दुनिया में ‘इस्लामी संस्कृति’ तलवार के जोर पर हर जगह पहुँचल-तब ओकरा जवाब में ‘अकबर इलाहाबादी’ एगो शेर में अर्ज करत बानीं- ये तो कहते हैं तलवार से फैला इस्लाम, ये न इरशाद हुआ तोप से फैला क्या है? व्यापार से ही संबंधित एगो कहावत में बतावल गईल बा कि- रुपया आवे तो हाथ काला. जाय तो मुँह काला.. आजु के संदर्भ में भी ई कहावत कतना सटीक बा, एकर कइगो उदाहरण हाल-फिलहाल के छापे के दौरान सामने आइल हा. एह तरह से देखल जाय त कहावतन , लोकोक्तियन अउर बुझवल के जरिये लोकव्यवहार के कइगो उलझल गाँठ के सुलझवें आ समझे में मदद मिल सकेला. https://hindi.news18.com/news/bhojpuri-news/indigenous-proverbs-and-kahavatein-languages-sahitya-bhojpuri-mohan-singh-4514651.html

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