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  • नाग पंचमी पर नाग देवता के दूध काहें चढ़ावल जाला: नाग पंचमी मनावय क परंपरा कब से अउर काहें शुरू भइल, एकर कवनो सही-सही जानकारी नाहीं हौ. लेकिन एकरे बारे में कई ठे लौकिक अउर पौराणिक कथा हयन. गरुण पुराण, भविष्य पुराण, चरक संहिता, सुश्रुत संहिता अउर दूसरे कई ग्रंथन में नागन के बारे में काफी कुछ लिखल हौ. नाग पंचमी के बारे में एक जानकारी इ हौ कि भगवान विष्णु सावन शुदी पंचमी के ही दिन विश्राम करय बदे शेष नाग के शैया के रूप में अपनइले रहलन. एही नाते इ दिन नाग देवता के समर्पित होइ गयल, ओनकर पूजा कयल जाए लगल. दूसर कथा समुद्र मंथन से जुड़ल हौ. समुद्र मंथन सावन में ही भयल रहल. समुद्र मंथन से अमृत से लेइ के विष तक तमाम चीज निकलल रहल. बढ़िया-बढ़िया चीज त देवता लोग लेइ लेहलन. लेकिन जब विष निकलल त सब भागि खड़ा भयल. अंत में सृष्टि के बचावय बदे बाबा भोलेनाथ के पूरा विष अपने कंठ में उतारय के पड़ल. कंठ नीला पड़ि गयल. भगवान नीलकंठ बनि गइलन. विष क असर ओनकरे कंठ में लिपटल वासुकी नाग पर भी पड़ल. विष के ताप से नाग देवता छठपटाए लगलन. जवने तरह से देवता लोग भगवान शिव के विष के असर से बचावय बदे तरह-तरह क विषहर उपाय कइलन, ओही तरे नाग देवता के भी विष के असर से बचावय बदे उपाय कइलन. नाग देवता के भीतर खुद विष रहल, लेकिन बहरे वाला विष जादा तेज रहल. विष क असर विष से ही खतम होला. बहरे वाले विष से बचावय बदे नाग के भीतर क विष पावरफुल करय क जरूरत रहल. एह से ओन्हय दूध देइ गयल. दूध क प्रकृति अइसन हौ कि विषधरन क विष तेज होइ जाला. दूध पइले से नाग देवता के बहुत अराम मिलल. जवने दिना इ घटना घटल, तिथि पंचमी रहल. तबय से नाग पंचमी के नागे क पूजा करय क परंपरा शुरू भइल.

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