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  • आज का शब्द: घोर और नागार्जुन की कविता- सिंदूर तिलकित भाल: घोर निर्जन में परिस्थिति ने दिया है डाल! याद आता है तुम्हारा सिंदूर तिलकित भाल! कौन है वह व्यक्ति जिसको चाहिए न समाज? कौन है वह एक जिसको नहीं पड़ता दूसरे से काज? चाहिए किसको नहीं सहयोग? चाहिए किसको नहीं सहवास? कौन चाहेगा कि उसका शून्य में टकराए यह उच्छ्वास? हो गया हूँ मैं नहीं पाषाण जिसको डाल दे कोई कहीं भी करेगा वह कभी कुछ न विरोध करेगा वह कुछ नहीं अनुरोध वेदना ही नहीं उसके पास उठेगा फिर कहाँ से निःश्वास मैं न साधारण, सचेतन जंतु यहाँ हाँ-ना किंतु और परंतु यहाँ हर्ष-विषाद-चिंता-क्रोध यहाँ है सुख-दुख का अवबोध यहाँ है प्रत्यक्ष औ’ अनुमान यहाँ स्मृति-विस्मृति सभी के स्थान तभी तो तुम याद आतीं प्राण, हो गया हूँ मैं नहीं पाषाण! https://www.amarujala.com/kavya/shabd-sangrah/aaj-ka-shabd-ghor-nagarjuna-best-poem-sindoor-tilkit-bhal

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