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  • Bhojpuri: खाली खरीदे बेंचे के मेला ना हा बलिया के ददरी मेला: आजु से 237 साल पहिले सन् 1884 के नवम्बर महीना में भारतेंदु हरिश्चंद्र जी के एह भाषण के आयोजन ‘आर्यदेशोपकारणी सभा’ कइलें रहे. सभा के सेक्रेटरी पंडित इंदिरादत्त उपाध्याय के संक्षिप्त औपचारिक परिचय के बाद भारतेन्दु जी के भाषण शुरू सभा के अध्यक्ष जिला कलक्टर डी डी राबर्ट्स कइलन. बाद में भारतेंदु जी के ऊँ भाषण ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ पत्रिका के दिसम्बर अंक में भी छपल. यहां ई बात अकारण नइखे कि आधुनिक सभ्यता में इंग्लैंड के औद्योगिक क्रांति से पूरा दुनिया में जवना ‘आधुनिक विकास’ शुरुआत मानल जाला – ऊँ ‘विकास’ भारतेंदु जी के पूरा भाषण में लगभग नदारद बा. ‘ ‘हर तरह से उन्नति’ से उन्नति के बार -बार हिदायत के बावजूद. अइसन नइखे कि भारतेंदु जी जब एह बात के चर्चा करत बानी कि “इंग्लैंड का पेट भी कभी यूं ही खाली था. उसने एक हाथ से अपना पेट भरा, दूसरे हाथ से उन्नति के राह में काँटों को साफ किया.” तब ऊहां के इंग्लैंड में18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध अउर 19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में ‘औघोगिक क्रांति’ के समय मशीन के जरिये तकनीकी बदलाव के द्वारा बड़े पैमाने पर उत्पादन से एकदम अनजान होखब. बाकि ओकरा वजह से जवना ‘विकास’ के स्वरूप दुनिया के सामने प्रकट भईल ओकरा के कम से कम भारतेंदु जी ‘सब तरह से उन्नति’ के अर्थ से अलहदा रूप में जरूर देखें के कोशिश होवें चाहीं. एह निहोरा के कुछ खास संदर्भ यहां जिक्र जरूरी बा. पहिलका ई कि भारतेंदु जी यहां ‘उन्नति’ के मतलब खाली आर्थिक समृद्धि के रूप में नइखे. वक्तिगत उन्नति से लेकर, सामाजिक उन्नति, धार्मिक अंधविश्वासों से मुक्ति, हिन्दू- मुसलमानों के बीच आपसी बैर भाव मिटावें के अलावा विदेशी भाषा के बजाय अपना भाषा पर भरोसा करें आ ओकरा जरिये ‘सब तरह उन्नति’ के बात कहल गईल बा. अब यहां मानवीय सभ्यता के उन्नति के इतिहास के मोटे तौर पर ( जवना के पश्चिमी सभ्यता में ‘विकास’ कहल जाला) चार चरण में परिभाषित कइल जा सकेला. पहिला चरण में मानव सभ्यता में जब परिवर्तन भईल- तब मानव समाज आखेटक समुदाय से अलग होकर, पशुपालक अउर खेतिहर समुदाय में तब्दील भईल. दुसरका चरण में खेतिहर से कुछ तकनीकी बदलाव की वजह से औद्योगिक उन्नति की ओर आगे बढ़ल. तीसरका चरण में औद्योगिक उन्नति से वाणिज्य-व्यापार में परिवर्तन भईल. आज के परिवर्तन के औद्योगिक क्रांति के चौथा चरण कहल जात बा. एह चरण के परिवर्तन में- कृत्रिम बौद्धिकता, रोबोटिक टेक्नोलॉजी, ‘थ्री डी’ अउर इंटरनेट ऑफ द थिंग्स के बड़ी भूमिका बा. ई परिवर्तन पहिले के कवनों युग के परिवर्तन से ज्यादा तेज अउर अनिश्चित बा. एह परिवर्तन के बारे में स्टीफेन हाकिन्स जइसन भैतिक शास्त्री और एलेन मस्क जइसन कारोबारी आशंका व्यक्त कर चुकल बाड़न कि- कृत्रिम बौद्धिकता के वजह से भविष्य में जवना तरह के परिवर्तन होखें वाला बा, ओकरा से कहीं मानव जाति अस्तितत्वे संकट में मत पड़ी जाऊँ?” अब तक के परिवर्तन से जाहिर बा कि तकनीकी बदलाव के साथ जीवन के हर क्षेत्र में कितना बड़ा परिवर्तन घटित होत बा. सब कुछ बदल जात बा. उत्पादन से लेकर, रहन-सहन, आवें-जायें के सुविधा-सम्पन्ता सब कुछ.एहि परिवर्तन के आधुनिक युग में ‘विकास’ कहल जात बा. भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी ददरी मेला वाला भाषण में ‘सब तरह की उन्नति’ जवना तरह के उन्नति के चर्चा करत बानी- ओकर कुल मतलब एह बात के बा कि भले आधुनिक विकास के हर चरण में कुल जोर – भैतिक- आर्थिक समृद्धि पर होखें. बाकि मानव जीवन के कवनों ‘स्वभावत कमी’ के दूर कर ‘सब तरह से उन्नति’ के उपाय यहां नइखे बतावल गईल. ‘विकास’ के कईगो आयाम हो सकेला. नतीजा भी कुछ सकारात्मकता-नकारात्मक हो सकेला. पर ‘उन्नति’ अउर के फर्क के कईगो पहलू के रेखांकित करें के आजु जरूरत महसूस होत बा. आधुनिक औघोगिक विकास देश विकास दर( जी डी पी) में खूब उछाल आइल. बाकि एह विकास से आम आदमी के जीवन में कतना खुशहाली (हैपी इंडेक्स) में इजाफ़ा भईल- एकर दावा करें के अब तक कवनो पैमाना ना तय हो पावल. प्रकृति अंधाधुंध शोषण के बल पर जवना तरह के विकास के तानाबाना दुनिया के सामने तैयार कर के परोसल गईल रहे ओकर खामियाजा आजु पूरा विश्व के सामने बा. ज्यादा से ज्यादा पूंजी के संग्रह के लालच में ज्यादा उर्जा के खपत पर आधारित विकास आजु दुनिया के सामने ई संकट खड़ा कर देले बा कि दुनिया सतत विकास के अलावा साझा भविष्य के बाद अब “एक सूर्य, एक विश्व अब ऊर्जा के एक ग्रिड” राग अलापें शुरू कइले बा. हालांकि गाँधी जी ‘हिन्दस्वराज’ पहिले ही चेता चुकल बाड़न कि “आधुनिक औद्योगिक सभ्यता में विनाश के बीज बा.” ई परिस्थिति एह से पैदा भईल कि “आधुनिक औद्योगिक विकास ने ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लालच में लोभ और हमारे जरूरत के फर्क को मिटा दिया. ” अभी हाले में स्कॉटलैंड के ग्लासगो सम्मेलन में दुनिया के कइगो देश एह ‘विकास’ से पैदा भईल संकट से निजात पावें खातिर सन् 2030 तक वायुमंडल के तापमान1.5 डिग्री कम करें के सवाल पर राजी भईल हा. एह राजीनामा पर दुनिया के विकसित देश कतना अमल करिहें- ई अभी भविष्य के सवाल बा? भारतेंदु हरिश्चंद्र जी के ‘ सब तरह से उन्नति’ के बात में ई एकदम साफ हो जाई कि आजु के दिन सामाजिक उन्नति के बिना विकास के कवन अइसन पैमाना बा- जवना से साम्प्रदायिक उन्माद- जातीय उन्माद कम होखें, धार्मिक अंधविश्वास के खात्मा होखें, धार्मिक सौहार्द्र, के माहौल तैयार होखें, गरीबी-अमीरी के लगातार चौड़ा होत पाट कइसे कम कइल जाय? बिना ‘हर तरह उन्नति’ एह सवालन के जबाब आजु के ‘विकास’ के चकाचौंध में कहां तक सम्भव बा? दुई एक जगह जरूर ‘ब्रिटीश राज’ के प्रति भक्ति-भाव के पदर्शन भी एह भाषण में बा. बाकि एह हिदायत के साथ बा कि- इस समय सरकार का राज पाकर और उन्नति का इतना समय भी तुम लोग न सुधरो तो तुम्हीं रहो. वह सुधारना भी सब बातों में होना चाहिए. ऐसे बातों को छोड़ो जो तुम्हारे इस पथ में कंटक हों. चाहे लोग निकम्मा कहें या नंगा कहैं. भारतेंदु हरिश्चंद्र जिन खराबियों की चर्चा कर रहल बानी ऊँ कई रूप में आजु भी मौजूद बा . ओकरा प्रति आगाह करत भारतेंदु जी कहत बानी कि “कोई धर्म की आड़ में, कोई देश की चाल में, कोई सुख के आड़ में छिपे हैं. उन चोरों को वहां से पकड़ उनको बांधकर कैद करों. इस समय जो बातें तुम्हारी उन्नति पथ की कांटा हों उनकी जड़ खोदकर फेंक दो.” भारतेंदु जी खुद सवाल खड़ा करत बानी कि उन्नति और सुधारना किस चिड़िया का नाम है? किसको अच्छा समझें? क्या लें क्या छोड़े? एह सवाल के जबाब में भारतेंदु जी बतावत बानी कि “ सब उन्नतियों का मूल धर्म है.” अब एह धर्म के व्याख्या करत ही व्यास जी बतावत बानी- नमो धर्माय महते धर्मो धारयति प्रजा:. यत् स्यात् धारणसंयुक्तम् स धर्मइत्यदाहृतः. उस धर्म को प्रणाम है, जो सब मनुष्यों को धारण करता है. सबको धारण करने वाला जो नियम हैं, वे धर्म हैं. धर्म के कटरपंथी लोगन के जइसन फटकार कबीर दास जी लगवले बाड़न – हिंदुअन के हिन्दूआई देखि, तुर्कन की तुरकाई. लगभग ओइसहिं हिदायत देत भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी कहत बानी – मुसलमान भाइयों को भी उचित है कि इस हिंदुस्तान में बस कर लोग हिंदुओं को नीचा समझना छोड़ दें. ठीक भाइयों की भाँति हिंदुओं से बर्ताव करें. घर में जब आग लगी तो जेठानी- घौरानी का आपस में डाह छोड़कर एक साथ वह आग बुझाना चाहिए. एह साफगोई से दुनो समुदायों को फटकार – एकरा पहिले काशी के ही संत कबीर लगा चुकल बाड़न. भारतेंदु के एह भाषण में देश के ‘आत्म निर्भर’ बनावें के बात भी खूब गंभीरता से बतावल गईल बा- परदेशी वस्तु और परदेशी भाषा पर भरोसा मत रखो. अपने देश में -अपने भाषा में उन्नति करो. भारतेन्दु हरिश्चंद्र के ‘ “सब तरह से उन्नति” वाली बात के बरक्स अब तक दुनिया में जतना तरह के विकास के चर्चा भईल बा- ओह में खाली आर्थिक समृद्धि के विकास के चर्चा अउर ओकरा के हासिल करें के उपाय बतावल गईल बा.अपना कमजोरी के समझिके ओह अनुरूप ‘उन्नति’ के उपाय पर कम चर्चा भईल बा. एह संदर्भ में देखल जाय तब कवनों मेला में- हजारों लोगन के हुजूम में भारतेंदु हरिश्चंद्र के ददरी मेला वाला भाषण सचमुच ऐतिहासिक और अनूठा बा. Source- https://hindi.news18.com/news/bhojpuri-news/ballia-ka-dadri-mela-interesting-facts-read-articles-in-bhojpuri-3863351.html

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