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  • Bhojpuri: मृत्यु के बारे में का सोचत रहलन आचार्य विनोबा भावे, पढ़ीं अउर जानीं: ज्ञान एह निडरता क कसौटी हौ. जे इ कसौटी कसि लेला ओकरे बदे मृत्यु जीवन क सबसे शुभ दिन बनि जाला. स्वतंत्रता सेनानी, समाजसेवी विनोबा भावे अइसनय एक विभूति रहलन. विनोबा मृत्यु के जीवन क सबसे शुभ घटना अउर सबसे शुभ दिन मानय. विनोबा अपने प्रबचन के दौरान कई बार मृत्यु पर विस्तार से चर्चा कइले रहलन. ओनकर कहना रहल कि मनुष्य कुछ समय बदे एह लोक में जनम लेला. ओकर स्थायी घर इहां नाहीं होत. एही से कुछ समय बाद वापस अपने असली घरे लौटि जाला. अब अपने असली घरे जाए से जादा खुशी क बात अउर शुभ दिन का होइ सकयला. चूकि आदमी के एकर ज्ञान नाहीं रहत, एह से उ एही लोक के आपन असली घर मानि बइठयला. दुख अउर डर क इहय कारण हौ. विनोबा क कहना रहल कि उ हमेशा मृत्यु क स्वागत करय बदे तइयार हयन. ईश्वर क जब भी इच्छा होई, इहां से खुशी-खुशी अपने असली घरे चलि जाब. ओह दिना शोक नाहीं, बल्कि उत्सव मनावय के चाही. विनोबा के बारे में कहल जाला कि ओन्हय अपने मृत्यु क अभास पहिलय होइ गयल रहल. नवंबर 1982 में उ बीमार पड़लन त खाना अउर दवा लेब छोड़ि देहलन. खाना में कमी त उ काफी पहिलय से कइ देहले रहलन. एकर जिक्र ओनकरे प्रबचन में मौजूद हौ. विनोबा एक दिना आश्रम के लोगन के बोलइलन अउर सबके राय से आपन अंतिम दिन तय कइ लेहलन. लेकिन ओनकर एक शिष्य आश्रम में मौजूद नाहीं रहल, अउर तय तिथि से एक-दुइ दिना बाद पहुंचय के रहल. जब ओकरे पास बाबा के अंतिम दिन क संदेशा पहुंचल त उ विनोबा के पास संदेशा भेजलस कि बिना हमरे अइले आप कइसे जाइ सकयलन. विनोबा अपने जाए क तिथि आगे बढ़ाइ देहलन. जब उ शिष्य आश्रम पहुंचि गयल तब विनोबा 15 नवंबर, 1982 के ध्यानस्थ भइलन अउर शरीर छोड़ि के अपने असली घरे चलि गइलन. 11 सितंबर, 1895 क जनमल विनोबा महात्मा गांधी क जिगरी सहयोगी रहलन. गांधी जी ओन्हय अक्टूबर 1940 में पहिला सत्याग्रही घोषित कइले रहलन. विनोबा महात्मा गांधी के साथे अजादी के आंदोलन में हिस्सा लेहलन, जेल भी गइलन, समाज सेवा भी कइलन, लेकिन ओनकर असली विषय अध्यात्म रहल. लोग ओन्हय गांधी क अध्यात्मिक उत्तराधिकारी मानयलन, लेकिन अध्यात्म के शिखर पर उ गांधी से मुलाकात से पहिलय पहुंचि गयल रहलन. इहां तक कि गांधी भी विनोबा के आपन बड़ी उपलब्धि मानय. विनोबा जब पहिली बार सात जून, 1916 के अहमदाबाद के कोचरब आश्रम में गांधी से मिललन, तब पहिली ही नजर में उ विनोबा के पहिचानि गइलन कि उ का चीज हउअन. विनोबा के बारे में ओनकर पहिली प्रतिक्रिया रहल कि इहां जेतना भी लोग आवयलन, कुछ न कुछ लेवय आवयलन, लेकिन इ एकमात्र आदमी हौ जवन इहां सिर्फ देवय आयल हौ. गांधी के प्रतिक्रिया से समझल जाइ सकयला कि विनोबा ओह समय तक अध्यात्म के केतने ऊंचाई पर पहुंचि चुकल रहलन. विनोबा के अध्यात्म अउर ज्ञान क रस्ता बतावय वाला दूसर केव नाहीं बल्कि खुद ओनकर माई रुक्मिणी बाई रहलिन. रुक्मिणी बाई बहुत विदुषी महिला रहलिन अउर आठो पहर भक्तिभाव में डूबल रहय. घरे के कामकाज से खाली भइले के बाद माई रुक्मिणी विनोबा के साथ धर्म, अध्यात्म अउर वैराग्य पर चर्चा करयं. खाली चर्चा ही नाहीं, बल्कि ओन्हय प्रेरित भी करयं. रुक्मिणी विनोबा के विन्या बोलावय. विनोबा क असली नाव विनायक नरहरि भावे रहल. विनायक के बचपन से गणित अउर विज्ञान से बहुत लगाव रहल. इ लगाव ओन्हय अपने बाबू नरहरि शंभू राव से मिलल रहल. हर बाती के वैज्ञानिक कसौटी पर कसब विनायक क बचपन से स्वभाव रहल. बाबू क वैज्ञानिक सोच अउर माई क अध्यात्मिक संस्कार मिलि के विनोबा क व्यक्तित्व तइयार भयल रहल. हाईस्कूल क पढ़ाई पूरी कइले के बाद विनोबा इंटरमीडियट बदे 1916 में महाराष्ट्र के कोलाबा जिला के अपने गांव गागोड से बंबई क रेलगाड़ी पकड़लन. सूरत पहुंचत-पहुंचत मन बदलि गयल अउर ओही उतरि गइलन. दूसरे प्लेटफार्म पर पूरब जाए वाली रेलगाड़ी खड़ी रहल अउर असली ज्ञान के तलाश में ओह गाड़ी पर सवार होइ गइलन. विनोबा क इच्छा बंगाल जाइ के उहां के क्रांति के बारे में समझय क अउर ओकरे बाद हिमालय के शांति में ज्ञात तलाशय क रहल. लेकिन उ रस्ते में काशी घूमय क मोह नाहीं छोड़ि पइलन, उहय काशी जहां जाए क मोह आदि शंकराचार्य तक नाहीं छोड़ि पइले रहलन. काशी में ओन्हय एक अखबार में महात्मा गांधी क भाषण पढ़य के मिलल. महात्मा गांधी इ ऐतिहासिक भाषण काशी हिंदू विश्वविद्यालय में चार फरवरी, 1916 के देहले रहलन. विनोबा भाषण से एतना प्रभावित भइलन कि गांधी के चिट्ठी लिखि मरलन. उधर से गांधी क जवाबी चिट्ठी बोलावा के साथ आइ गयल. गांधी से मुलाकात के बाद विनोबा के जीवन क दिशा बदलि गयल. विनोबा क कहना रहल कि जवने क्रांति अउर शांति के तलाश में उ निकलल रहलन, उ एक जगह गांधी के रूप में ओन्हय मिलि गयल. लेकिन गीता ओनके जीवन क फिर भी अधार बनल रहल. माई के कहले पर ही उ मात्र 20 साल के उमर में गीता क मराठी में अनुवाद शुरू कइ देहले रहलन, काहें से कि रुक्मिणी बाई गीता क कठिन संस्कृत न समझि पावयं. माई के ही आशीर्वाद से विनोबा संस्कृत, तमिल, तेलुगू, बंगाली, गुजराती, मराठी, कन्नड़, उर्दू, फारसी, फ्रेंच, जर्मन, अंग्रेजी सहित कई भाषा पर अधिकार हासिल कइ चुकल रहलन. भगवद् गीता क उ जवन मीमांसा कइलन ओइसन आजतक केव नाहीं कइ पइलस. गीता ही नाहीं, उ बाइबिल अउर कुरान तक क व्याख्या कइलन. विनोबा क सबसे बड़ा अभियान भूदान आंदोलन रहल. देश के भूमिहीनन बदे जमींदारन से जमीन मांगय बदे उ पूरे देश क भ्रमण कइलन. सन 1951 में आंध्र प्रदेश के पोचमपल्ली से शुरू भयल इ आंदोलन 13 साल तक चलल अउर विनोबा 58,741 किलोमीटर क यात्रा कइलन. कुल 44 लाख एकड़ जमीन दान में मिलल, जवने में से 13 लाख एकड़ जमीन भूमिहीन किसानन के बांटल गइल. एह आंदोलन क पूरी दुनिया में प्रशंशा भइल अउर विनोबा के पहिला रमन मैगसेसे पुरस्कार मिलल. लेकिन उत्तर प्रदेश अउर बिहार में बड़े पैमाने पर भूदान में बेइमानी भइल. भूदान में बेइमानी क जानकारी जब विनोबा के लगल त ओन्हय बहुत दुख भयल अउर उ एक नारा के साथ भूदान आंदोलन क ओही समापन कइ देहलन. उ नारा रहल – बी से बाबा, बी से भूदान और बी से बोगस. Source-https://hindi.news18.com/news/bhojpuri-news/what-does-acharya-vinoba-bhave-think-about-death-read-in-bhojpuri-3850541.html

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