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  • Bhojpuri उपन्यास के इतिहास-पुरुष रामनाथ पाण्डेय: छपरा शहर के रतनपुरा मोहल्ला में आठ जून,1924 के जनमल रामनाथ जी के पैतृक गांव रहे नवतन,जहवां से स्कूली पढ़ाई शुरू भइल रहे.आगा के शिक्षा एकमा आउर जिला स्कूल ,छपरा में चलल. आई कॉम के इम्तिहान पास कऽके उहांके रेल महकमा के नोकरी में रोजी-रोटी खातिर अझुरा गइनीं.बाकिर ज्ञान-पिपासा शांत ना भइल आ आजाद विद्यार्थी का रूप में उहांके बी काॅम,साहित्यालंकार, साहित्य रत्न वगैरह उपाधि हासिल कइनीं. पाण्डेय जी के लेखन के सिरीगनेस हिन्दी में भइल रहे आ उहांके ‘वह वेश्या थी’,’फूल झड़ गया:भौंरा रो पड़ा’,’नई जिन्दगी:नया जमाना’,’मचलती जवानी’ वगैरह एक दर्जन उपन्यास लिखनीं.बाकिर महापंडित राहुल सांकृत्यायन के नेक सलाह पर एकाएक उहांके आंतर मातृभाषा के सेवा खातिर तड़पि उठल रहे आ ओही घरी से ठानि लेले रहनीं कि उहांके अब भोजपुरी आ सिरिफ भोजपुरिए के विकास-बढ़न्ती खातिर तन-मन-धन से लवसान रहबि. सन् 1956में जब खाली रामनाथे जी के ना,बलुक भोजपुरी भाषा में छपल पहिलका उपन्यास ‘बिंदिया’ शीर्षक से प्रकाश में आइल,त ओकर मंजूरी एगो ऐतिहासिक घटना का रूप में भइल.महापंडित राहुल बाबा के त खुशी के पारावार ना रहे.उपन्यास पढ़िके उहांके अपना चिट्ठी में लिखले रहनीं-‘भोजपुरी में उपन्यास लिखकर आपने बहुत उपयोगी काम किया है.भाषा की शुद्धता का आपने जितना ख्याल रखा है, वह भी स्तुत्य है. लघु उपन्यास होने से यद्यपि पाठक पुस्तक समाप्त करते समय अतृप्त ही रह जाएगा,पर उसके स्वाद की दाद तो हर एक पाठक देगा.आपकी लेखनी की उत्तरोत्तर सफलता चाहता हूं.’ देश आजाद भइला का बाद हालांकि गांधीवादी सोच के जोर रहे आ ओह घरी स्त्री-विमर्श जइसन कवनो अवधारना ना रहे,भोजपुरी के ई पहिल उपन्यास ‘बिंदिया’ नारिए विमर्श पर केन्द्रित रहे.ई उपन्यासकार के दृष्टिसम्पन्नता के सूचक रहे.उपन्यास के नायिका बिंदिया अकसरुआ बेमार बाप के लमहर-चाकर खेती-गिरस्ती के भरोसेमंद दलित बुजुर्ग आ ईमानदार मेहनती अनाथ नवही के भरोसे ना खाली सम्हारत बिया,बलुक गांव के एगो कामचोर शराबी से आपन बियाह तय कइला प बाप के निरनय के खिलाफतो करत बिया.आखिरकार ओह मेहनतकश अनाथ का संगें भागिके दलित अभिभावक के मदत से शादी रचावत बिया आ मरनासन्न बाप के जब अपना करनी प पछतावा होत बा,त उहां पहुंचिके बेटा के फरजो निभावत बिया.उपन्यास में भोजपुरिया स्वाभिमान कूटि-कूटिके भरल बा आ भोजपुरी के ई पहिलके उपन्यास मील के पाथर साबित होत बा.शेखर प्रकाशन के बाद भोजपुरी संसद,बनारस ओकर प्रकाशन कइले रहे आ एह साल सर्वभाषा ट्रस्ट, दिल्ली ओकर तिसरका संस्करण छपले बा.भोजपुरी नायक राकेश पांडेय ‘बिंदिया’ प फिलिमो बनावल चाहत रहले,बाकिर करार संभव ना हो पावल रहे. पहिलका उपन्यास के कामयाबी का बाद पाण्डेय जी के उपन्यास-लेखन अबाध गति से आगा बढ़े लागल रहे आ एक-एक कऽके चारि गो अउरी उपन्यास प्रकाशित भइलन स-‘जिनगी के राह’,’महेन्दर मिसिर’,’इमरीतिया काकी’ आउर ‘आधे-आध’.’बिंदिया’ में जहवां गंवई परिवेश में पलल-बढ़ल,खिलाफ हवा से लोहा लेत,दीढ़ता आ साहस के जियतार मूरत नारी के लीखि से अलगा हटिके कइल कारनामा के रेघरिआवे जोग चित्र उकेरल गइल रहे,उहवें ‘जिनगी के राह’ में विद्यार्थिए जीवन से अनियाय के खिलाफ जद्दोजहद करेवाला प्रमोद के,आगा चलिके मजूरन के वाजिब हक खातिर शोषण-उत्पीड़न के विरुद्ध लगातार संघर्ष के दास्तान पेश कइल गइल रहे. ‘बिंदिया’ के कथानक अउर विस्तार पवले रहे तिसरका उपन्यास ‘इमरीतिया काकी’ में. एह में दलित परिवार के नायिका इमरीतिया ना सिरिफ जाति-धरम, ऊंच-नीच,अगड़ा-पिछड़ा के विभेद खाड़ कऽके अपना छुद्र सवारथ खातिर समाज के बांटेवाली राजनेता के साजिश के खुलासा करत बिया, बलुक जनचेतना जगावे के दिसाईं सार्थक पहलकदमिओ करत बिया. एह सभ सामाजिक उपन्यासन से अलगा हटिके पाण्डेय जी 1994 में एगो ऐतिहासिक उपन्यास के सिरिजना कइले रहनीं आ ऊ उपन्यास भोजपुरी के जियतार गीतकार, पूरबी के बेताज बादशाह महेन्दर मिसिर के रसिकमिजाजी आ जाली नोट छापे के धन्हा से जुड़ल किंवदंतियन-भ्रांतियन के भ्रमजाल के तूरत उन्हुका के एगो स्वाधीनता संग्राम सेनानी, कर्मठ योद्धा,राष्ट्रीय गीतकार आउर महान संगीत साधक का रूप में प्रतिष्ठित करे का गरज से लिखाइल रहे.उपन्यास ‘महेन्दर मिसिर’ ओह चरित्र के आजादी का प्रति दीवानगी आ संगीत साधना के बेजोड़ मिसाल पेश करत बा.कहानी 1858 से शुरू हो तिया. बाबू हलवंत सहाय के जमींदारी आ ओह जमींदारी से गुरु नियर आदर-मान पावत शिवशंकर मिसिर आ उन्हुकर पत्नी गायत्री कुंअर.धनी-मानी परिवार में मेंहदार के महेन्दर बाबा के किरिपा से महेन्दर मिसिर के जनम.संगीत आ गायकी के जनमजात हुनर.संगीत-प्रेमी हलवंत सहाय के खुश करे खातिर तवायफ ढेलाबाई के उठाके हलवंत सहाय के कोठी में पहुंचावल.ढेलाबाई से नाराजगी प केसरबाई से प्रणय आ संगीत साधना.ओने स्वामी अभयानंद के अगुवाई में आजादी के लड़ाई में बढ़िचढ़िके हिस्सादारी.ब्रिटिश शासन के अरथ-बेवस्था के मटियामेट करेके दियानत से जाली नोट छापे के अभियान.गिरफ्तारी, मोकदिमा आ जेहल के सजाइ. आखिर में ढेलाबाई के मंदिर में जिनिगी के अंतिम जातरा.महेन्दर मिसिर के शख्सियत के फेरु से पड़ताल करे प उपन्यास मजबूर करत बा आ ओह चरित्र के नया सिरा से विवेचित-विश्लेषित करे के दिसाईं शोधार्थियन के राह देखावत बा. चाहे ऐतिहासिक उपन्यास होखे भा सामाजिक-पाण्डेय जी के सभ उपन्यास प्रवाह, पठनीयता आ प्रभावोत्पादकता का लेहाज से बेजोड़ बाड़न स. उपन्यास का संगें-संगें कहानिओ का हलका में पाण्डेय जी के योगदान महत्वपूर्ण रहल बा.उहां के सात गो चुनिंदा कहानियन के संग्रह ‘सतवंती’ भोजपुरी संस्थान,पटना से 1977 में प्रकाशित भइल रहे.देशभक्ति से ओतप्रोत उहां के दस प्रतिनिधि कहानी ‘देश के पुकार पर’ संग्रह में संग्रहीत बाड़ी स. ओइसे त पाण्डेय जी के भोजपुरी के पहिलका उपन्यास ‘बिंदिया’ प अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन का ओरि से जगन्नाथ सिंह पुरस्कार, ‘इमरीतिया काकी’ प अभय-आनंद पुरस्कार आ ‘महेन्दर मिसिर’ प राजमंगल सिंह पुरस्कार का संगहीं ‘भोजपुरी भास्कर’सम्मानोपाधिओ मिलल रहे, बाकिर उहांके कद एह सम्मान-पुरस्कार से बहुते ऊंच रहे.उहांके भोजपुरी के बढ़न्ती आ विकासे के आपन सभसे बड़हन मान-सम्मान मानत रहनीं. पाण्डेय जी किछु पत्रिकनो के संपादन में आपन योगदान देले रहनीं.कथाकार वीरेन्द्र नारायण पाण्डेय का साथे उहांके कहानी के पत्रिका ‘चाक’ के संपादन कइले रहनीं.भोजपुरी में जवना विधा में अपेक्षाकृत कम काम भइल रहे, ओके धियान में राखत भोजपुरी में लरिकन के पहिल पत्रिका ‘नवनिहाल’ के प्रकाशन कइनीं आ अपना छोट बेटा अर्द्धेन्दु भूषण के संपादक बनवनीं.अइसहीं प्रोफेसर हरिकिशोर पाण्डेय के संगें लेके उहांके भोजपुरी आलोचना के पहिलकी पत्रिका ‘कसउटी’ के संपादन-प्रकाशन कइले रहनीं.हरदम उहांके एह बात के चिंता रहत रहे कि कइसे भोजपुरी साहित्य के सभ विधा में गुणात्मक आ परिमाणात्मक दृष्टि से विपुल आउर मानक साहित्य के सिरिजना लगातार होत रही? पंडित रामनाथ पाण्डेय भोजपुरी साहित्य के अइसन छतनार झगांठ बर के बिरिछ रहनीं, जेकरा शीतल छांह में साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियन के कई पीढ़ी एके संगे प्रेरना लेत रहे.अदब में सियासत के उहांके घोर विरोधी रहनीं.बाकिर दिल में केहू खातिर कबो कवनो दुराव ना रहे.उहांके व्यक्तित्व छल-छद्म से कोसन दूर जतने सहज रहे,ओतने उदार आ विराटो रहे.सही माने में उहांके भोजपुरी साहित्य के संत रहनीं.जब अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन से उहांके वैचारिक मतभेद भइल, त उहांके अखिल भारतीय भोजपुरी भाषा सम्मेलन में चलि गइनीं आ सम्मेलन के अध्यक्षो बनावल गइनीं, बाकिर जब पुरनकी संस्था से जब कबो बोलावा भा नेवता जाइ,उहांके हाजिर हो जात रहनीं.एक बेरि जे उहां से मिलि लेत रहे,ऊ हरदम-हरदम खातिर उहांके मुरीद हो जात रहे.नवही पीढ़ी के त प्रेरनास्रोत रहनीं आ साहित्य के अलख जगावे का गरज से छपरा,सीवान,गोपालगंज समेत गांवागाईं जाके कविसम्मेलन, विचारगोष्ठियन के आयोजन में उहांके अगहर भूमिका निबाहत रहनीं. हमरा संगें त आदरणीय पाण्डेय जी, उहांके बेटा विमलेन्दु भूषण, अर्द्धेन्दु भूषण से अपना परिवार नियर गहिर-गझिन नेह-नाता रहे.हरेक महीना, जब हम पटना से गांवें जाईं, त कुछ घंटा छपरा में उहांके घर पर जरूर गुजारत रहनीं.उहांके मांगि-मांगिके हमार कहानी ‘चाक’ में छापत रहनीं.’कसउटी’ के प्रवेशांके में उहांके हमरा उपन्यास ‘दरद के डहर’ के समीक्षा लिखिके छपले रहनीं.अर्द्धेन्दु त ‘नवनिहाल’ के हर अंक खातिर हमार रचना लेत रहलन. पाण्डेय जी के लेखन के प्रतिबद्धता समाज के वंचित वर्ग, दलित आ स्त्री का प्रति रहत रहे आ उहांके मानवीय संवेदना जगावे के पल-पल उतजोग करत रहनीं.जइसन लिखीं, ओइसने जिनिगी जियतो रहीं.ना कवनो देखावा,ना कवनो बनावटीपन.उहां के पत्नी असाध्य रोग से पीड़ित होके बहुत बखत ले खटपर रहनीं.पाण्डेय जी जतना धीरज आ समरपित भाव से चउबिस घंटा उहांके सेवा में लागल रहत रहनीं कि देखेवाला घबड़ा जात रहे, बाकिर उहांके माथ प ना कवनो शिकन,ना घबड़ाहट भा शिकवा-शिकाइत.सही माने में उहांके निष्काम करमजोगी रहनीं. उहांके संवेदनशीलता,मनुजता आउर भारतीय संस्कृति के जियतार दरपन रहनीं.ओह कालजयी कृतिकार के पावन इयाद में हमार प्रणामांजलि. Source- https://hindi.news18.com/news/bhojpuri-news/know-about-bhojpuri-novel-history-man-ramnath-pandey-3832403.html

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