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  • Bhojpuri: नहान, ध्यान, दान अउर दीपदान क पावन महीना कातिक: मान्यता हौ कि पूरे कातिक भर भगवान विष्णु पवित्र जल में निवास करयलन. एही के नाते कातिक में पवित्र नदी, तलाब अउर कुंड में नहान क परंपरा हौ. मानल जाला कि कातिक महीना में सूरुज उअय से पहिले पवित्र नदी में नहाइ के भगवान विष्णु अउर लक्ष्मी माई क पूजा-अराधना करा त धन-धान्य अउर सौभाग्य प्राप्त होला.

    कातिक महीना क शुरुआत शरद पूर्णिमा से होइ जाला. लेकिन एह साल कातिक एक दिन बाद यानी 21 अक्टूबर से शुरू होइ के 19 नवंबर तक रही. कातिक में कई त्योहार पड़यलन, जवने में करवा चउथ, धनतेरस, रूप चौदस, दिवाली, गोवर्धन पूजा, भैया दूज, अउर देव उठनी एकादशी प्रमुख हयन. कातिक महीना क समापन गुरु पूर्णिमा या नानक पूर्णिमा के साथ होला. कातिक चातुर्मास क आखिरी महीना हौ.

    कातिक महीना के महिमा क वर्णन स्कंद पुराण, नारद पुराण अउर पद्म पुराण में भी कयल गयल हौ. स्कंद पुराण में कातिक के सबसे श्रेष्ठ महीना बतावल गयल हौ. न कार्तिक समो मासो, न कृतेन समं युगम्. न वेद सदृशं शस्त्रं, न तीर्थ गंगा समम..

    यानी कातिक जइसन न त कवनो महीना हौ, सतयुग जइसन न कवनो युग हौ, वेद के समान न कवनो शास्त्र हयन, अउर गंगा जी की नाईं न कवनों तीरथ हयन. कातिक महीना अगर सबसे श्रेष्ठ हौ त आखिर एकरे पीछे का करण हौ? स्कंद पुराण में ही लिखल गयल हौ.

    रोगापहं पातकनाशकृत्परं सद्बुद्धिदं पुत्रधनादिसाधकम्. मुक्तेर्निदानं नहि कार्तिकव्रताद् विष्णुप्रियादन्यदिहास्ति भूतले..

    यानी कातिक महीना स्वास्थ्य प्रदान करय वाला, रोगनाशक, सद्बुद्धि देवय वाला अउर माई लक्ष्मी के साधना बदे सबसे बढ़िया हौ. कातिक नहाए बदे प्रयागराज, अयोध्या, हरिद्वार, कुरुक्षेत्र, पुष्कर अउर काशी के सबसे बढ़िया मानल गयल हौ. एकरे अलावा जेतना भी पवित्र नदी अउर तीरथ हयन, उहां भी कातिक नहइले से पुन्य मिलयला. अगर नदी, तीरथ जाए क जुगाड़ न बइठय त घरही पानी में गंगा जल मिलाइ के नहाइ ल, अउर नहात समय इ मंत्र क उच्चारण करा, पुन्य मिलि जाई.

    गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति. नर्मदे सिंधु कावेरि जलेऽस्मिन् संनिधि कुरु..

    कातिक में गृहस्थ लोगन के देही में करियवा तिल अउर औरा क चूरन मलि के फिर नहाए के चाही. दूइज, सत्तमी, नवमी, दशमी, तेरस अउर अमौसा के दिन तिल अउर औरा क चूरन मलि के नहाए क मनाही हौ. संन्यासी लोगन के तुलसी के पौधा के जड़ में लगल मट्टी देही में मलले के बाद नहाए के चाही. नहइले के बाद साफ कपड़ा पहिनि के भगवान विष्णु क पूजा करा, अउर तुलसी, केला, पिपरे के पेड़े के नीचे दिया जरावा.

    पूरे कातिक भर जमीन पर सूता. मास-मछरी, मट्ठा, लहसुन-पियाज क सेवन मत करा. तुलसी क पूजा करा अउर तुलसी के पत्ता क सेवन करा. कातिक में द्विदलन यानी उड़द, मूंग, मसूर, चना, मटर, राई मत खा. पूरे महीना भर ब्रह्मचर्य क पालन करा, नाहीं त पति-पत्नी के दोष लगयला. कातिक नहाए क संकल्प लेवय वालन के पूरे महीना में खाली एक दिन नरक चतुर्दशी यानी अंधियरिया पाख के चतुर्दशी के देही में तेल लगावय के चाही. पूरे कातिक भर तपस्वी की नाईं संयम रखा यानी कम बोला, केहू क शिकाइत मत करा, विवाद मत करा.

    कातिक में विधि विधान से नहान, दान, दीपदान, हवन-यज्ञ, व्रत कइले से जीवन भर क पाप कटि जाला अउर मरले के बाद सरगे क दरवाजा खुलि जाला. कातिक के पुन्नवासी से शुरू करा अउर हरेक पुन्नवासी के राती के उपवास अउर जागरण करा त कुल मनोरथ सिद्ध होइ जाला, अइसन मान्यता हौ.

    कातिक में काशी नहाए क खास महत्व हौ. जवन पुन्य प्रयाग में कुंभ नहइले से मिलयला, उहय कातिक में काशी नहइले से मिलि जाला. मान्यता हौ कि कातिक में गंगा नहाए बदे सरग से देवता लोग काशी में उतरयलन. एही के नाते पंचगंगा घाटे से लेइ के अस्सी घाटे तक भक्त लोग देवतन के स्वागत में दीया जरावयलन, आकाशदीप जरावयलन. औरत लोग गंगा घाटे पर तुलसी बियाह क आयोजन करयलिन. पूरा कातिक महीना काशी में गंगा घाटे पर जइसे सरग उतरल रहयला.

    Source- https://hindi.news18.com/news/bhojpuri-news/know-interesting-facts-about-kartik-mahina-in-bhojpuri-3809040.html

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