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  • Bhojpuri: संस्कृत-संस्कृति के अनमोल रतन आचार्य रघुनाथ शर्मा: शर्मा जी ओह घरी खास तौर से सउंसे देश में शोहरत के बुलंदी के छुअले रहनीं, जब 7 मई,1985 के उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी का तरफ से एक लाख रोपेया के ‘विश्व संस्कृत भारती पुरस्कार’ उहां के तत्कालीन प्रधानमंत्री का हाथ से मिलल रहे.ओइसे संस्कृत के विशिष्ट साधना आ पांडित्य खातिर पंडी जी के दिहल गइल पुरस्कार-सम्मान आउर उपाधियन के एगो लमहर सूची रहे.उत्तर प्रदेश शासन के पुरस्कार योजना समिति से कालिदास पुरस्कार, विशिष्ट संस्कृत सेवा पुरस्कार, पांडित्य-शास्त्र निष्ठा खातिर राष्ट्रपति पुरस्कार,संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय ,वाराणसी से ‘विद्या वाचस्पति’ के उपाधि,प्रयाग हिन्दी साहित्य सम्मेलन से ‘महामहोपाध्याय’ के मानद उपाधि, विश्व संस्कृत सम्मेलन के मोका प काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से डी लिट के उपाधि के अलंकरण. छव जुलाई,1899 के उत्तर प्रदेश में बलिया जिला के पूर्वांचल के गांव छाता में जनमल रघुनाथ जी के बाबूजी पंडित काशीनाथ शास्त्री संस्कृत के अइसन धुरंधर विद्वान रहनीं कि उहां के पांडित्य के लोहा काशी के दिग्गज पंडितो लो मानत रहे.महामना मदन मोहन मालवीय, शिव प्रसाद गुप्त,बाबा राघवदास जइसन विख्यात हस्ती उहाँके आपन गुरु मानत रहे.इहे वजह रहे कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भूमि पूजन,शिलान्यास आ उद्घाटन के मोका प उहांके अगहर भूमिका रहल.हिन्दी के सुप्रसिद्ध समालोचक पंडित पद्म सिंह शर्मा आपन किताब ‘पद्म पराग’ में शास्त्री जी पर दूगो अध्याय लिखले रहलन.बड़ भाई पं हरिनाथ शास्त्रिओ संस्कृत आ धर्मशास्त्र के जानल-मानल विद्वान रहलन. एह तरी, रघुनाथ शर्मा के संस्कृत के माहौल विरासत में मिलल रहे.लरिकाइएं से ऊ खुद के संस्कृत भाषा, व्याकरण,दर्शन खातिर समर्पित कऽ देले रहलन.गांव के पाठशाला का बाद गुरुकुल कांगड़ी के ‘आनंदाश्रम’ में रहिके विधिवत पढ़ाई शुरू भइल रहे.लघुकौमुदी,रघुवंश,सिद्धांत कौमुदी,तर्कसंग्रह वगैरह के अध्ययन करत राजकीय संस्कृत काॅलेज,वाराणसी से मध्यमा,फेरु आगा चलिके शास्त्री आ आचार्य के उपाधि मिलल रहे.वेदांत में विशिष्टता हासिल कइला का बाद बनारसे में पहिले संन्यासी संस्कृत महाविद्यालय में अठारह रोपेया महीना पर वेदांत पढ़ावे के नोकरी मिलल.फेरु मारवाड़ी आ ब्रह्म विद्या संस्कृत विद्यालय में साथ-साथ अध्यापन के सिलसिला चलल.तब जाके राजकीय संस्कृत काॅलेज में चालीस रोपेया माहवारी प अध्यापकी होखे लागल.जब राजकीय संस्कृत काॅलेज के रूपांतरण संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय का रूप में भइल,त आचार्य रघुनाथ शर्मा के बहाली वेदांत विभागाध्यक्ष आ प्राध्यापक पद पर भइल,जहवां से 1965में सेवानिवृत्त हो गइनीं.ओकरा बीस साल के बाद जब विश्व संस्कृत भारती पुरस्कार मिलल,त आचार्य जी पर सभके धियान गइल. हिन्दुस्तान टाइम्स समूह के मशहूर पत्रिका ‘कादम्बिनी’ के तत्कालीन संपादक राजेन्द्र अवस्थी जी के जब हमरा सनेस मिलल कि आचार्य रघुनाथ शर्मा के साक्षात्कार कके हम तुरंत भेजीं, त पटना से बलिया जाके छायाकार अचल आ साहित्यिक संघतिया श्रीप्रकाश का संगें हम पसिंजर गाड़ी में बइठिके छाता आसचौरा हाॅल्ट स्टेशन पहुंचल रहलीं.राह में छाता गांव के एगो परिचित बतवले रहलन-‘ओही परिवार के विद्वता का चलते छाता के लहुरी काशी कहल जाला.रघुनाथ बाबा में रउआं ठेठ लोकसंस्कृति के झलक मिली.गांव के पहिरावा धोती-गंजी आ बहरी गइला प कुरता आउर झोरा में लोटा-डोर-सातू के गठरी उहां के निशानी होला.एक हाली अमेरिका से एगो शोधार्थी आइल.ओह घरी बाबा अपना खेत में खुरपी से घासि गढ़त रहनीं.गांव के एगो लरिका आगंतुक के खेत में पहुंचा दिहलस.बाबा जब धाराप्रवाह संस्कृत में लगातार बोले लगनीं, त ओ बेचारा के बोलतिए बन्न हो गइल. फेरु त ऊ बाबा के गोड़ पकड़ि लिहलस.’ थोरहीं देरी में हमनीं के पंडी जी के मकान ‘मातृ सदन’ में दाखिल भइलीं जा.हाता में चंदन,मौलसिरी के गांछ आ किसिम-किसिम के फूलन के गमक नाक में समाए लागल.बरंडा में बिछावल खटिया पर बइठिके लिखे में लवसान पंडीजी के देह प कमर से कान्ह प ले लपिटाइल बस एगो धोती रहे.छिआसी बरिस के उमिर में ना त आंखि पर चश्मा चढ़ल रहे,ना मुंह में के दांते टूटल रहे.जब हम आवे के मकसद बतवलीं,त उहांके हंसत कहनीं, ‘हमरा में अइसन का बा,जवन चरचा लायक होखे.हम त अपना के एगो विद्यार्थी बूझेलीं.’बतकही में उहांके बड़प्पन झलकत रहे. आखिर कवन ऊ किताब ह,जवना पर उहांके विश्व संस्कृत भारती पुरस्कार मिलल रहे? पंडी जी बतावे लगनीं, ‘बात ओह घरी के ह,जब हम संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के अध्यक्ष रहलीं.लखनऊ विश्वविद्यालय आ संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के कुलपति प्रो सुब्रह्मण्यम अय्यर निहोरा कइलन कि हम भर्तृहरि के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘वाक्यपदीय’ पर संस्कृत टीका लिखीं.ओइसे त संस्कृत के एगो किताब प कई गो टीका लिखेके परिपाटी रहल बा.राजा भर्तृहरि के एह महाकाव्य ‘वाक्यपदीय’ सिरिफ तीन गो टीका रहली स-एगो त खुद भर्तृहरि के ‘स्वोपज्ञवृति’,दोसर पुण्यराज के टीका आउर तीसर हेलाराज के टीका.हम तीनों टीका का संगें आपन टीका लिखलीं, जवन सात खंड में ‘अम्बाकर्त्री’ शीर्षक से संस्कृत विश्वविद्यालय ,वाराणसी से प्रकाशित भइल.एकरा के पूरा करे में तीस साल के समय लागल.’वाक्यपदीय’ जतने दुरूह आ क्लिष्ट बा,’अम्बाकर्त्री’ के ओतने सहज आ बोधगम्य बनावे के कोशिश कइले बानीं.एह ग्रंथ पर ‘अम्बाकर्त्री’ अइसन पहिल टीका बा,जवन हर दृष्टि से पूर्ण बा.एही से स्वोपज्ञवृति, पुण्य राज,हेलाराज के टीका एके संगे दिहल गइल बा, जवना से कि पढ़निहार एकर खासियत समुझि सके.’ पंडी जी के लेखन कब शुरू भइल रहे आ उहांके कवन-कवन किताब लिखनीं? पंडी जी अहथिर होके जवाब देले रहनीं- ‘सभसे पहिले हम जयदेव मिश्र के ‘विजया’ के सार-संक्षेप ‘लघुजूटिका’ शीर्षक से ओह घरी लिखले रहलीं, जब हम आचार्य के विद्यार्थी रहलीं.ओकरा बाद ‘चित्सुखी’ के संपादन कइलीं.तिसरकी किताब रहे ‘व्याकरण महाभाष्य’,जवन दू खंड में प्रकाशित भइल रहे.’चित्रनिबंधावलि:’में भारतीय सभ्यता, संस्कृति, पुराण, नीति, विज्ञान वगैरह प वैचारिक निबंध संकलित बाड़न स.ई कुल्हि निबंध संस्कृत काॅलेज के मुखपत्र ‘सरस्वती सुषमा’ में छपल आ चर्चित भइल रहलन स.स्वामी करपात्री जी के अनुरोध पर ‘अहमर्थ विवेक’ लिखलीं, जवन बहुत लोकप्रिय भइल रहे.संस्कृत भाषा, व्याकरण से संबंधित अलगा अलगा मोका प दिहल गइल व्याख्यानन के संग्रह ‘व्याकरण दर्शन बिंदु:’ छपल.ओकरा बाद संस्कृत विश्वविद्यालय से प्रकाशित भइल-अनेक स्तोत्र के काव्य ‘स्तोत्र-वल्लरी’.आठ सर्ग के एगो महाकाव्य बा ‘पार्वती परिणय’,जवन महाकवि कालिदास के कुमार संभव के आधार मानिके लिखल गइल रहे. एगो अउर महत्वपूर्ण किताब बा ‘अष्टक विमर्श’,जवना में पाणिनि के ‘अष्टाध्यायी’ के सहज व्याख्या बा.हमार मूल स्थापना ई बा कि ‘अष्टाध्यायी’ में कात्यायन प्रणीत ओह वार्तिकन के, जवना के पतंजलि भी आवश्यक मनले रहले,कवनो जरूरत नइखे.मए काम सूत्रे से सम्पन्न हो जाई.एह तरी,हम कात्यायन आ पतंजलि के मान्यता के खंडन कइले बानीं.संस्कृत में जहवां सिद्धांत भेद बा,ओमें एकरूपता ले आइल हमार उद्देश्य रहल बा.’पाठभेद निर्णय’ के 132 पाठ में विभिन्न शंका के सरल समाधान पेश कइले बानीं.एने हम स्तुतियो लिखलीं हां,जवना में 12,000 श्लोक बा.बारह सइ श्लोक त ‘संततिस्तव’ में बा.एकरा अलावे बा-‘सूर्य स्तव’,’खरूमा शतकम्’,’वायु स्तव’,’अपराजिता शतकम्’,’लक्ष्मी स्तव’,’शीतला शतकम् ‘वगैरह.दूगो वृहद काव्य के सृजन चलत बा-एगो त श्रीमद्भागवत के आधार मानिके आ दोसर वाल्मीकि रामायण के आधार बनाके.’ अच्छा, सेवानिवृति का बाद गांव में रहेके निरनय का पाछा का मकसद बा?’सवाल सुनते उहांके जवाब दिहनीं-‘देख भाई,हम ठहरलीं लोकसंस्कृति के मजा लेबेवाला मनई.काशी के कोलाहल से हमार मन उचटि गइल रहे.साधना खातिर एकांत जरूरी बा.एकरा खातिर हम अपना गांव के उपयुक्त बुझलीं.ओइसे इहवों देश-विदेश के विद्वान आवत रहेलन.’ पंडी जी बतावे लगनीं कि अमेरिका में फिलाडेल्फिया नगर के पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय में भाषा विज्ञान के प्राध्यापक-विभागाध्यक्ष जाॅर्ज कार्डोना,जे पाणिनीय शास्त्र आ भाषा विज्ञान के सुप्रसिद्ध विद्वान हउअन,अक्सर पंडी जी के दर्शन खातिर गांवें आवेलन.मारीशस के डॉ ठाकुर प्रसाद मिश्र, संस्कृत विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर में कुलपति डॉ सत्यव्रत शास्त्री, दिल्ली विश्वविद्यालय के रघुनाथ पाण्डेय, डॉ रमाशंकर भट्टाचार्य आ संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के रामप्रसाद त्रिपाठी, ब्रजवल्लभ द्विवेदी, जगन्नाथ उपाध्याय, देवस्वरूप मिश्र वगैरह शिष्यन के आवत रहे के सूचना उहांके दिहनीं. मन में सवाल उठल रहे कि उत्तर भारत के तुलना में दक्खिन भारत के संस्कृत भाषा के का हाल बा? पंडी जी के कहनाम रहे-‘संस्कृत के शिक्षा-बेवस्था ओतना निमन ना रहला के कारन उत्तर भारत के लोग वेद से कटत चलि गइल, जबकि दक्खिन भारतीय वेद से जुड़ल रहलन.बाकिर अंगरेजी के वर्चस्व के वजह से ओहू लो के संस्कृत कमजोर होत चलि गइल.तबहूं संस्कृत में ओह लो के काम ढेर बा.ई बात अलगा बा कि किताब ज्यादा उत्तर भारत के लोगन के छपल बा.’ बतकही चलते रहे कि पंडी जी के एगो पुत्र बहरी अइलन.ऊ रहलन प्रो रमानाथ शर्मा, जे अमेरिका के होनोलुलू में भाषा विज्ञान के प्राध्यापक रहलन.उन्हुका हाथ में अविमुक्तनाथ पाण्डेय के लिखल एगो सारगर्भित लेख रहे-‘पंडित रघुनाथ शर्मा :एक सारस्वत व्यक्तित्व’.ऊ पंडी जी के दिनचर्या बतावे लगलन-चार बजे भोर में जागल,डेढ़-दू घंटा टहरल,चिंतन,स्वाध्याय आ लेखन.पंडी जी भागवत पुराण के आधार पर एवरेस्टे पर्वत के सुमेरु पर्वत बतावत रहनीं आ सरगलोक के परिकल्पनो के विस्तार से समुझावेलगनीं. चलत-चलत हम पूछि बइठल रहलीं, ‘संस्कृत के वर्तमान स्थिति देखिके कइसन लागेला?’ ‘संस्कृत के वर्तमान स्थिति!’ पंडी जी के मुंह पर पीरा झलकत रहे, ‘एकदम अधोपतन बा.शिक्षा के मौजूदा पद्धतिए गलत बा.पहिले विद्या ज्ञानार्जन खातिर हासिल कइल जात रहे, खाली जीविका खातिर ना.विद्या के फल प्रज्ञा आ प्रज्ञा के फल उत्साह होला.जे भारतीय होके संस्कृत ना पढ़,ओकर जिनिगी व्यर्थ बा,काहें कि ई भाषा भारतीय सभ्यता आ संस्कृति के जननी ह.इहे कारन बा कि सांस्कृतिक पतन दिन प दिन होते जा रहल बा.अगर इहे हाल रही,त संस्कृत निश्चित रूप से अपने देश में एगो विदेशी भाषा बनिके रहि जाई.’ Source- https://hindi.news18.com/news/bhojpuri-news/know-about-acharya-raghunath-sharma-in-bhojpuri-3809728.html

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