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  • Bhojpuri: बदलत जाता बंगाल के भोजपुरिया समाज के खान-पान: त रउरा कहब कि भाई ई बदलाव खाली भोजपुरिए समाज में नइखे आइल, हर समाज में आइल बा। त सरकार रउरा बिल्कुल ठीक कहतानी, बाकिर ई बताईं कि हमनी के परंपरागत भोजन परंपरा लुप्त होता कि ना? अगली पीढ़ी जनबे ना करी कि बजका- फुलौरा (बेसन से बने वाला व्यंजन) का रहल ह। ओकर सवाद कइसन रहल ह। राब (गुड़ के एगो लिक्विड रूप) का रहल ह आ ओकर सवाद कइसन रहल ह। महुआ के पुआ खइला पर कइसन लागत रहल ह। अब कहिंए कहीं महुआ के फूल लउकता। हमनीं के पुरनिया आधा महुआ आ आधा आटा के मेल क के ओमें गुड़ डालि के पुआ बनवावत रहल ह लोग। बहुते स्वादिष्ट लागेला ई पुआ। सुपाच्य भी होला। मालपुआ ओकरा आगा कुछू नइखे। अच्छा अब नया पीढ़ी में जौन पतोह बहू) आवतारी सन ऊ कुल खान- पान के बारे में अनभिज्ञ बाड़ी सन। ओकनी के ज्यादा समय अपना कैरियर बनावे में लागल बा। ओकनी का कौनो मल्टीनेशनल कंपनी में काम करतारी सन। घर में दू पइसा आवता बाकिर पतोह जल्दी बने वाला खाद्य सामग्री- चाउमीन भा नूडल्स के पसंद करतिया। समय बांचता। बाकिर सभे जानता कि ई कुल “जंक फूड” कहाला। जंक फूड में चीनी भा वसा के हाई लेवेल रहेला जौन डायबिटीज, अल्सर भा अउरी कई गो रोग के कारण बनेला। आ जंक फूड में फायदा करे वाला फाइबर, प्रोटीन, विटामिन, मिनरल आ अउरी कुल फायदामंद तत्व ना रहेलन स। मीठा पेय पदार्थ (कोल्ड ड्रिंक वगैरह), पैकेट में मिले वाला फ्रूट जूस, ब्रेड, पैस्ट्री, कुकीज आ केक वगैरह एही जंक फूड में शामिल बा। फ्रेंच फ्राई आ आलू के चिप्स भी जंक फूड ह। चाउमिन, नूडल्स, पिजा आ पास्ता ढेर चाव से खाइल जाता। एह कुल के प्रचलन मध्यवर्गीय भोजपुरिया समाज में परमानेंट जगह बना लेले बिया। बच्चा सब लिट्टी- चोखा के नांव सुनते मुंह बिजुका लेतारे सन। अब रउरा कहब कि रोज- रोज लिट्टी- चोखा परोसाई त लइका उबयाइए जाई। त सरकार रोज- रोज ना त महीना में एको दिन ई कुल बने के चाहीं। ताकि लइका अपना परंपरागत भोजन के जानत रह सन। त आजकाल के लइकन के ओकर सवादे नइखे नीक लागत। एमें हमनी के दोष बा। कौनो परंपरागत भोजन के एह तरीका से बना के लइकन दिहल जाउ कि ओकनी का ओकरा पर मुग्ध हो जासन। तब जाके हमनी के परंपरा बांची। बाकिर एगो अउरी समस्या बा। कोलकाता में त गोइंठा भा चिपरी ना मिली, बाकिर बंगाल के छोट जगहन पर भी अब गोइंठा- चिपरी के प्रयोग केहू नइखे करत। हं, कहीं- कहीं कोयला पर चाय, खाना के परंपरा आजुओ बा। बाकिर बुरादा वाला चूल्हा, अब लुप्तप्राय बा। सबकरा घरे गैस के चूल्हा बड़ले बा। ओकरा पर त लिट्टी- चोखा बनी ना। हं एगो भोजपुरिया व्यंजन आजुओ लोकप्रिय बा आ लइको चाव से खाले सन। ओह व्यंजन के नांव ह- गोझा। गोझा कइसे बनेला? ई रउरा सब जानतानी। नइखीं जानत त मन परा देतानी। बड़ आकार के गुझिया नियर आटा के आकृति के भीतर उबालल, पीसल मसालेदार चना के दाल भरि दिहल जाला आ ओकरा के पानी के भाप से पका दिहल जाला। त ई होला ब्वायल्ड फूड। बिसेस तरह के दाल के पेस्ट वाला गुझिया पाकि जाला त बड़ा स्वादिष्ट लागेला। त ई भइल गोझा। सुखद बात ई बा कि आजकाल के स्कूली लइका गोझा के फरमाइश करतारे सन। लिट्टी- चोखा लुप्त ना होई। काहें से कि चना के सतुआ भरल, घीव में लपेटल लिट्टी, गाढ़ दाल का संगे खइला पर बड़ा स्वादिष्ट लागेला। ओह सवाद के वर्णन करे खातिर कौनो शब्द एह संसार में नइखे। लइकाईं पर भले ई छात्र- छात्रा लिट्टी- चोखा से विरक्त हो जा सन, बाकिर बड़ भइला पर अद्भुत सवाद के कारन ओकनी के एकरा प्रति मुग्ध होखहीं के परी। एगो अउरी व्यंजन के लुप्त होखे के डर बा। ओकर नांव ह- लपसी। अब रउरा पूछि सकेनी कि लपसी कइसे बनेला? त सरकार, आटा के सूखले कराही में भूंजि के लाल क दिहल जाला आ ओकरा में चीनी मिलल पानी डालि के गाढ़ा घोल बने तक पकावल जाला। ई भइल लपसी। खाए में बड़ा स्वादिष्ट लागेला। हमार दांत उखराइल रहे त कड़ा चीज खाए के मना रहे। त एक दिन हम लपसिए पर काटि दिहनी। एह व्यंजन पर एगो गाना भी बा- “ लपसी के गुन गवलो ना जाला ”। ई कुल हमनी के गांव के पुरनिया लोगन के अविष्कार कइल व्यंजन हउव सन। ओह घरी हर गांव में त मिठाई के दोकान रहे ना। त लोग- हलुआ, लपसी, तिल भा तीसी के लड्डू, तिलवा वगैरह के ही घरेलू मिठाई के तौर पर चाव से खात रहल ह लोग। एकरा में पोषक तत्व भी रहत रहल ह। बाकिर धीरे- धीरे बाजारीकरण के दौर चरम पर पहुंचि गइल आ घरे व्यंजन बनावे के परंपरा खतम हो गइल। अब नवकी पतोह तिसी के लड्डू कइसे बनेला, जानते नइखी सन। ओकनियो के दोष नइखे। ऊ कुल पढ़ाई- लिखाई आ कैरियर का सामने कुल रसोई कला न्यौछावर क देतारी सन। ओकनी का स्कूल के टिफिन में अपना बच्चा के ब्रेड, पैस्ट्री भा नूडल वगैरह देके जान छोड़ावतारी सन। काहें से कि ओकनियो के अपना आफिस जाए के बा, पति के टिफिन भी लगभग ओइसने रहता। पति के टिफिन में त रोटी के स्थान बा। बाकिर लइकन के स्कूली टिफिन में खुद लइके रोटी ले जाएके तेयार नइखे। कहता कि कुल लइका नीमन- नीमन (जंक फूड “नीमन” कहाता) टिफिन लेआवतारे सन। त हम काहें रोटी ले जाइब। हमनी के पौष्टिक आ स्वादिष्ट व्यंजन के खोज करीं जा ताकि लइकन से जंक फूड से छुटकारा मिलो। भोजपुरिया संस्कृति में खान- पान के प्रमुख स्थान बा। बाकिर जदि पारंपरिक व्यंजन के एहीतरे छोड़ दिहल जाई त हमनी के लइका पुरान परंपरा से अपरिचित रहि जइहन स। पहिनावा- ओढ़ावा (ड्रेस) त यूनिवर्सल होइए गइल बा, खान- पान भी यूनिवर्सल हो जाई। फेर राउर बोली- बानी ही राउर पहिचान रहि जाई। आ अब त कुछ लोग भोजपुरियो बोलल छोड़त जाता। लइकन के बच्चा पर से ही हिंदी में बोले के सिखावता। त ऊहो अपना लइकन के हिंदिए सिखाई। अब तनी मेहनत करेके जरूरत बा। भोजपुरी के संसार के प्रतिष्ठित भाषा के रूप में शीर्ष पर राखे खातिर हमनी के एगो ब्लू प्रिंट तेयार करेके चाहीं। उच्च कोटि के रचना के संग्रह जरूरी बा जौना में हर क्षेत्र के लेखक आ कवि रहे लोग। भोजपुरी विश्व के प्रेरणा भाषा बने, एकरा खातिर प्रयास जरूरी बा। Source- https://hindi.news18.com/news/bhojpuri-news/noodles-is-more-demanded-then-litti-chokha-read-article-in-bhojpuri-3797168.html

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