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  • Bhojpuri: एदइयां आठय दिना क रही नवरातर, जानीं का होई असर: काशी निवासी पंडित कमलेश नारायण मिश्र क कहना हौ कि एह साल नवरातर में तृतीया अउर चतुर्थी एकय दिना पड़त हौ। एह से नौरातर एक दिन कम होइ जाई। लेकिन इ दूनों तिथि क एकय दिन पड़ब शुभ नाहीं हौ। ज्योतिष शास्त्र में इ संयोग अनिष्टकारी मानल गयल हौ। मान्यता हौ कि देवी मइया हर नवरातर में धरती पर आवयलिन अउर भक्तन से पूजा स्वीकार करयलिन। एह नवरातर में देवी मइया पालकी में सवार होइ के आवत हइन। देवी क इ रूप भी आफत-बिपत क संकेत बा।

    नवरातर क शुरुआत गुरुवार के होत हौ, अउर दशमी शुक्रवार के पड़त हौ। शास्त्र के अनुसार, गुरुवार अउर शुक्रवार के माई क सवारी डोली-पालकी होला। पंडित कमलेश के अनुसार, माई क डोली में सवारी औरतन के सशक्तीकरण क त निशानी हौ, लेकिन दूसरी तरफ इ बाढ़, भूकंप, भूस्खलन, आगजनी, बड़ी दुर्घटना, राजनीतिक उथल-पुथल जइसन प्राकृतिक अउर अप्राकृतिक घटना के बढ़य क भी संकेत हौ। तृतीया के साथे चतुर्थी के पड़ले से सबसे जादा परेशानी सरकार के उप्पर आवयला। एकर असर एक सप्ताह पहिलय से शुरू होइ जाला, अउर एक सप्ताह बाद तक रहयला। यानी पूरा अक्टूबर क महीना उथल-पुथल वाला रहि सकयला। एह समय देश में जवन बवाल मचल बा, लगत हौ एही ज्योतिषीय संयोग क परिणाम हौ।

    खास बात इ भी हौ कि सात अक्टूबर के कलश स्थापना क मुहूरत सबेरय 6 बजि के 17 मिनट से सात बजि के सात मिनट तक ही हौ। एह के नाते विधि विधान से कलश स्थापना भी अपने आप में एक चुनौती हौ। कम समय मिलले के नाते विशेषज्ञ पुरोहित सबके बदे उपलब्ध न होइ पइहय। एह साल क नवरातर जेतना कठिन हौ, पूजा-पाठ में ओतनय सावधानी भी बरतय क जरूरत हौ। अच्छा फल तबय मिली जब माई क पूरे साफ-सफाई के साथे पूरे श्रद्धा भाव से व्रत-पूजा कयल जाई, ठीक ओइसय जइसे भगवान राम कइले रहलन। भगवान राम लंका पर चढ़ाई करय से पहिले नौ दिना तक व्रत रहि के माई दुर्गा क अराधना कइले रहलन। माई खुश होइ के राम के शक्ति प्रदान कइले रहलिन। तब राम लंका पर चढ़ाई कइलन अउर दशहरा के दिना रावण क बध कइलन।

    नवरातर के बारे में एक अउर पौराणिक कथा हौ। महिषासुर कठोर तपस्या कइ के अजेय होवय क देवतन से वरदान लेइ लेहले रहल। एकरे बाद महिषासुर देवतनय के परेशान करय लगल। फिर देवता लोग मिलि के दुर्गा माई क रचना कइलन, अउर ओन्हय तमाम अस्त्र-शस्त्र देहलन। दुर्गा माई क महिषासुर से नौ दिना तक युद्ध चलल अउर अंत में महिषासुर मारल गयल। इहय नौ दिन नवरात्रि कहायल अउर तबय से नवरातर में माई दुर्गा के पूजा क परंपरा शुरू भयल। लेकिन इहां सवाल इ उठयला कि नवरात्रि काहे कहायल, नवदिन काहे नाहीं। दरअसल, ऋषि मुनि लोग पूजा-अराधना बदे राती के जादा सही मनले हउअन। राती के शांति रहयल, वातावरण शुद्ध रहयला, जबकि दिन क समय शोर-गुल से भरल रहयला। सिद्धि बदे शांति जरूरी होला। शांति में ही ध्यान लगयला, ध्यान दूर तक, सूक्ष्म तक जाला। वैज्ञानिक रूप से भी रात के अवाज दूर तक जाला, दूर तक सुनाला। एही के नाते शक्ति के पूजा बदे राती क समय चुनल गयल। नवरात्रि, शिवरात्रि, होली, दिवाली जेतना भी त्योहार हयन सब राती के ही मनावल जालन।

    नवरातर के नौ दिना पार्वती, लक्ष्मी अउर सरस्वती के नौ रूपन क पूरे विधि विधान से दर्शन-पूजन कयल जाला। माई क नौ रूप में शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धदात्री शामिल हइन। काशी में देवी के नवों रूप क अलग-अलग मंदिर हयन, जहां भक्त लोग नवों दिना क्रम से माई क दर्शन-पूजन करय जालन। काशी में एह साल सार्वजनिक पूजा पंडाल क भी अनुमति प्रशासन देइ देहले हौ। कोरोना के नाते पिछले साल दुर्गा पंडाल नाही स्थापित भयल रहलन। एह साल कुल 251 पूजा पंडाल स्थापित होइहय। काशी जोन में 134 अउर वरुणा जोन में 117 दुर्गा पंडाल स्थापित होइहय। पूजा पंडाल स्थापित करय में कोविड प्रोटोकाल क सख्ती से पालन करय क प्रशासन निर्देश देहले हौ। Source- https://hindi.news18.com/news/bhojpuri-news/navratri-2021-will-be-of-8-days-this-year-know-what-would-be-the-effect-of-it-3783410.html

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