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  • Bhojpuri: काशी के सांस्कृतिक धरोहर के बचावें खातिर, केहू त आगे आवे: आजु बाबा भैरव ऐलानिया तौर पूरा देश से “ दुनो हाथ उठाके गुहार लगावत बानी कि काशी के ऐतिहासिक- पौराणिक धरोहर पूरी नष्ट होखें के कगार पर पहुंच गईल बा, बाकि ओकरा के बचावें खातिर केहूँ आगे नईखें आवत,हमार बातो नईखें सुनत।” हालांकि, ई बात सुनें में बड़ा नीक लागेलें कि काशी (बनारस) देश के सांस्कृतिक राजधानी ह। दुनिया के सबसे प्राचीन नगर भी। प्राचीन काल से ही भारत में काशी, दरभंगा(बिहार) अउर बंगाल के नवदीप के ज्ञान-संस्कृति के प्रमुख केंद्र के रूप में मान्यता मिलल बा। देश के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी जब पहिलका बार सन 2014 में काशी से चुनाव लड़े अईनीं, तब एह बात के घोषणा बड़ा धूमधाम से भईल रहें कि भविष्य में काशी (बनारस) देश के फिर से बौद्धिक केंद्र बनीं।

    काशी के बौद्धिक केंद्र बनावें के पहिले, नगर सांस्कृतिक विरासत बचावल जरूरी बा: कवनों नगर के सांस्कृतिक अउर बौद्धिक केंद्र बनावें में ओह नगर के सांस्कृतिक-पुरातात्विक धरोहर के संरक्षण-संवर्धन के उपाय कइल भी ओतने जरूरी होला। काशी के दुनिया के सबसे प्राचीन नगर बतावें वाला साक्ष्य ही जब मिट जाई, तब आगे आवें वाला पीढ़ी के कइसे पता चलीं कि काशी के विरासत आ ओह बहाने अपना देश के पुरानी संस्कृति- सभ्यता अउर ज्ञान -विज्ञान के परंपरा का रहल।? ई जानकारी तब के पोथी- पात्रा, किताब अउर पाण्डुलिपिन में ही मौजूद बा। एह खातिर काशी के पुराना पुस्तकालयन के अउर पुरातात्विक सामग्री के संरक्षण- सुरक्षा के उपाय कइल, कई मायने में काशी के सांस्कृतिक विरासत के संजोये खातिर बेहद जरूरी बा। अंग्रेज कवि कार्लाइल कहलें बाड़न कि “अच्छी किताबन के संग्रह के आज के दिन सबसे अच्छा विश्वविद्यालय कहल जा सकेला।” काशी के अगर ‘सर्वविघा’ के राजधानी के दर्जा हासिल बा, तब ओकरा पीछे एह नगर प्रचलित मौखिक पद्धति से गुरु- शिष्य परम्परा के तहत ज्ञान-शिक्षा के एक पीढ़ी से दूसरका पीढ़ी तक पहुँचावें वाला विद्वान आचार्य भी मौजूद रहलन। आजु अइसन गुरुकुल पद्धति काशी से गायब हो गईल बा।तब ज्ञान- शिक्षा अर्जित करें खातिर पुस्तकालय अउर बाचल- खुचल पाण्डुलिपियन पर ही ज्ञान के प्रामाणिक स्रोत के तौर पर निर्भर रहें के होई। काशी के प्राचीन पुस्तकालयन में देश भर के पाण्डुलिपियन के भंडार, ज्ञान -साधना के लगभग हर विधा, खासकर प्राचीन विद्या के अध्ययन सामग्री प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहल। पुस्तकालयन के एह अध्ययन सामग्री से ही श्रेष्ठ गुरुअन के मार्गदर्शन काशी में दूर -दूर से पढ़े आवें वाला विद्यार्थी अपना ज्ञान – पिपासा के शांत कर आ गहन शोध कार्य में लागल रहें। आजु आलम ई बा कि काशी के ज्ञान-संस्कृति के अनमोल धरोहर पर विकट संकट पैदा हो गइल बा। ज्यादा तकलीफ एह बात के लेके बा, कि एकरा के बचावें खातिर जनता से सहयोग(क्राउड फनडिंग) के गुहार लगावें के अलावा कवनों अउर उपाय नईखें देखात। जन सहयोग से ही एह प्राचीन धरोहर के निर्माण भी भईल रहें, अब जन-सहयोगी प्रयास से, केतना बचीं कि ना बचीं ? कहल ना जा सकें।

    घुड़साल में शुरू भईल रहें काशी नगरी प्रचारिणी सभा: इहवें तिलक महराज घोषित कइनीं हिंदी के राष्ट्रीय भाषा बनारस शहर के बीचों – बीच स्थित “काशी नागरी प्रचारिणी सभा” की स्थापना 16 जुलाई 1893 ई के भईल। हिंदी साहित्य खड़ी बोली आ नागरी लिपि अउर देश के स्वाधीनता आंदोलन में एह संस्था के कतना योगदान रहें, ई सब बात इतिहास में दर्ज हो चुकल बा। ई बात भी याद रहें के चाहीं कि काशी नागरी प्रचारिणी सभा के प्रांगण में ही बाल गंगाधर तिलक जी घोषणा कइनीं कि “ हिंदी ही भारत की राष्ट्र भाषा हो सकती है। देवनागरी लिपि को भारत की सभी भाषाओं के वैकल्पिक रूप में प्रयुक्त होना चाहिए।”

    ई बात 1905 के ह बनारस में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के बैठक भईल रहें। तब रमेश चंद्र दत के अध्यक्षता में एगो भाषा सम्मेलन भी भईल रहें। तब आशुतोष मुखर्जी के अध्यक्षता एगो न्यासी मंडल बनल रहें।लाला लाजपतराय अउर तेज बहादुर सप्रू एह संस्था के आर्थिक- नैतिक सहयोग कइलें रहलन। गोबिंद बल्लभ पंत सन 1908 तक1.5 रुपये के मदद करत रहलन। काशी, उदयपुर, ग्वालियर, खेतड़ी, बीकानेर, कोटा, बूंदी रीवा के राज परिवार से भी हर तरह के मदद मिलल रहें। पर ई सब मदद त बाद में आइल। पर कल्पना करीं ऊँ समय के जब काशी नागरी प्रचारिणी सभा के मूर्त रूप देबे कल्पना जेहन में पैदा भईल होई। ओह कल्पना के वाला मूर्त रूप देबे वाला चौदह साल से कम उमिर के नवीं दरजा में पढ़े वाला तीन गो विद्यार्थी रहलन। एह संस्था के शरुआत पहिले एगो घुड़साल से भईल रहें। बनारस के क्वींस कॉलेज में पढ़े वाला एह लड़िकन के नाम रहें- बाबू श्याम सुंदर दास, रामनारायण मिश्र, अउर शिव कुमार सिंह। आजु ओह काशी नागरी प्रचारिणी सभा के ‘कैम्पस’ स्थित “आर्य भाषा पुस्तकालय” ‘मैरिज हाल’ के रूप में इस्तेमाल होत बा।

    देश के चोटी के साहित्यकारन अउर क्रान्तिकारियन के अड़ी रहल कारमाइकल पुस्तकालय: बनारस के बांसफाटक स्थिति पहिला सार्वजनिक पुस्तकालय रहल कारमाइकल पुस्तकालय। एह पुस्तकालय के स्थापना में बनारस के कमिश्नर रहें सी पी कारमाइकल बड़ा योगदान रहल। एह पुस्तकालय के जमीन खरीदे में महाराजा विजया नगरम और काशी के रईसन के सहयोग रहल। शिव प्रसाद सितारे हिन्द कारमाइकल पुस्तकालय के अध्यक्ष अउर जानकी प्रसाद मेहता एकर पहिलका ‘लाइब्रेरियन’ रहलन। मुशी प्रेमचंद, भारतेन्दु हरिश्चंद्र, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद दिवेदी के अक्सरहां यहां जुटान होखें। साहित्यकारन अउर सामाजिक-राजनीतिक कार्यकरतन के अड़ी भी कारमाइकल पुस्तकालय रहल। काकोरी षडयंत्र केश के आरोपी मुकुंदी लाल के गिरफ्तारी एह लाइब्रेरी से ही भईल रहें। एह पुस्तकालय में एक लाख से अधिका पुस्तक अउर हस्तलिखित पाण्डुलिपिन के संग्रह रहल। कुछ दिन पहिले एह पुस्तकालय पर एगो ‘होलसेल’ साड़ी बिक्रेता के कब्जा भईल, अब ई पुस्तकालय ‘ काशी विश्वनाथ कॉरिडोर’ के विशेष सफाई अभियान के भेंट चढ़ी गईल। इहवाँ के लाखों पुस्तकें अउर बहुमूल्य हस्तलिखित पाण्डुलिपि कहां गईल? ओकर पुरसा हाल केहूं नइखें।

    सरस्वती पुस्तकालय के स्वर्णाक्षर पाण्डुलिपिन के रखें खातिर कपड़ा भी नइखें: अंगरेजन के जमाना में बनल संपूर्णानंद विश्वविद्यालय स्थिति “सरस्वती पुस्तकालय” जहाँ स्वर्णपत्र, ताम्रपत्र, तालपत्र अउर भोजपत्र पर लिखल सदियों पुरानी पांडुलिपियां नष्ट होखें के कगार पर पहुंच गईल बा। बाकि एह पांडुलिपियन के सुरक्षित राखें खातिर एगो खास किस्म के रसायन युक्त कपड़ा(खरवा) के खरीदे के बजट पिछले चालीस साल से विश्वविद्यालय प्रशासन के पाले नइखें। सरकार के ओर से भी कवनों मदद ना मिलल। इहे ना सन 2014 में जर्जर भवन के जीर्णोद्धार खातिर राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान के तहत एक करोड़ के प्रस्ताव भी भेंजल गईल रहें, बाकि ओकरा पर आजतक कवनों करवाई ना भईल। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक जी भी एह बहुमूल्य पाण्डुलिपिन के ‘ डिजिटाइजेशन’ के प्रस्ताव सरकार के भेंजे के सुझाव देले रहनीं। बाक़ी बात आईल-गईल- हो – गईल से आगे ना बढ़ी पावल।

    सरस्वती पुस्तकालय के स्थापना भारतीय अउर पश्चिमी दृष्टिकोण के मेल- मिलाप, आधात्मिक अउर सांस्कृतिक अध्ययन खातिर भईल रहें। राजकीय संस्कृत महा विघालय के स्थापना( सन1844 ई में) अउर मुख्य भवन के निर्माण वेल्स के राजकुमार अउर राजकुमारी के आगमन के समय 16 नवम्बर 1907 के भईल रहें। एह पुस्तकालय में देवनागरी, खरोष्टि, बांग्ला, उड़िया, नेवाड़ी, शारदा, गुरुमुखी,तेलगु , कन्नड़ की पांडुलिपियाँ उपलब्ध बा। सन 1980 तक पूरा देश से पांडुलिपियां यहां आवत रहें। आजु भी यहां स्वर्णाक्षर युक्त ‘रासपंचाध्यायी’ अउर एक हजार साल पुराना भागवत गीता के प्रति उपलब्ध बा। एह पुस्तकालय में कुल एक लाख नब्बे हजार पुस्तकें अउर एक लाख से अधिका संस्कृत के पांडुलिपि आजु तक उपलब्ध बा। हालांकि बदइंतजामी के चलते केतना दिन लें बचल रहीं कहल ना जा सकें। बनारस के ललिता घाट स्थिति ‘गोयनका पुस्तकालय’ सन 1926 में गौरी शंकर गोयनका जी के देन रहें। गौरी शंकर गोयनका चार बीघा जमीन खरीद के ई पुस्तकालय बनवलें रहलन। एह पुस्तकालय में तंत्र, वेद , पुराण, ज्योतिष, व्याकरण अउर बारहों दर्शन, आगम तंत्र से संबंधित पुस्तकन अउर पाण्डुलिपिन के अदभुत संग्रह रहल। आजु एह पुस्तकालय के भवन अतना जीर्ण-शीर्ण हो गईल बा कि खड़ा होखें के स्थिति में नइखें रहीं गईल। अब ई पुस्तकालय ‘विश्वनाथ कॉरिडोर’ के जद में आई गईल बा। बनारस प्रशासन ‘गोयनका पुस्तकालय’ के पाण्डुलिपिन के ‘डिजिटाइजेशन’ के आश्वासन दिहलें बा । गोयनका पुस्तकालय के ट्रस्टी सुधीर झा के दावा बा कि देश एक-दो के पुस्कालयन के छोड़के कवनों अउर पुस्तकालय एकरा सामने खड़ा ना हो सकें।

    अभिमन्यु पुस्तकालय बनारस के नक्शा से ही नापता हो गईल: बनारस के गुरुबाग स्थिति स्वतन्त्रता सेनानियन द्वारा स्थापित ‘अभिमन्यु पुस्तकालय’ के वजूद के आजु कवनों थाह– पता नइखें चलत। एह पुस्तकालय में जब बनारस के ‘आज’ अउर ‘हंस’ अखबार बंद हो गईल रहें। तब विष्णु राव पराडकर जी ‘रणभेरी’ गोपनीय अखबार निकालत रहनीं। एह पुस्तकालय में रणभेरी, तूफान, रणडंका, चंडिका के प्रति हाल तक राखल रहें। शोधार्थी छात्रन के ई पुस्तकालय मुफ्त में अध्ययन सामग्री भी उपलब्ध करावत रहें। एह पुस्कालय में कई गो क्रांतिकारियन के अखबार अउर गोपनीय पत्र भी मौजूद रहल। आजु ई पुस्तकालय बनारस के नक्शा से ही गायब हो गइल बा। आज काशी (बनारस) ‘हेरिटेज सिटी’ रहें कि ‘स्मार्ट सिटी’ बनें एहि जदोजहद से दू-चार हो रहल बा। हालांकि, दुनिया में काशी के शोहरत कभी भी भौतिक प्रगति के वजह से ना रहल। ज्ञान-संस्कृति-सभ्यता, अध्यात्म के रूप में ही काशी के गौरव प्राप्त रहें। बाकि काशी के आमजन आजुओ अपना दैनिक प्रार्थना में गोहरावेला कि “ चना-चबेना गंग जल, जो पुरवे करतार। काशी कबहूँ न छोड़िये विश्वनाथ दरबार।। Source- https://hindi.news18.com/news/bhojpuri-news/banaras-is-going-to-become-a-smart-city-somebody-come-forward-to-save-the-heritage-of-kashi-3769399.html

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