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  • Bhojpuri: काशी में गंगा से पहिले क अनोखा कुंड, जहां पितरपख में लगयला भूतन क मेला: काशी मोक्ष नगरी हौ त इहां मरले के बाद सबके मोक्ष मिलि जाला, सबय सरगे पहुंचि जाला, लेकिन जेकर मउत कवनो घटना-दुर्घटना में अकलसकलय होइ जाला उ प्रेत योनि में फंसि जाला। अइसन आत्मा के प्रेत योनि से निकालि के सरगे पहुंचावय बदे पिशाचमोचन में त्रिपिंडी श्राद्ध करय के पड़यला। कहल जाला कि पितरपख में इहां भूतन-प्रेतन क मेला लगयला। देश-दुनिया से हजारन के संख्या में लोग इहां पितरपख में त्रिपिंडी श्राद्ध, अउर नारायण बलि करय आवयलन। श्राद्ध बदे जे गया जाला, उहो पहिले पिशाचमोचन में त्रिपिंडी श्राद्ध करयला। त्रिपिंडी श्राद्ध बदे मट्टी क तीन ठे कलशा स्थापित कयल जाला। सात्विक, राजसी अउर तामसी तीन तरह के प्रेतन बदे तीन रंग क यानी सफेद, लाल अउर करिया झंडी लगावल जाला। तीनों रंग के भगवान कृष्ण, ब्रह्मा अउर शिव क प्रतीक मानि के ओन्हय तर्पण कयल जाला। पिशाचमोचन तीर्थ क वर्णन गरुण पुराण में कयल गयल हौ। पिशाचमोचन पर मौजूद पीपरे क पेड़ भी बहुत महत्व वाला हौ। एही पेड़े पर भूतन-प्रेतन के बइठावल जाला। पेड़े पर सिक्का लगावय क परंपरा हौ। पेड़े पर एतना सिक्का लगल बा कि पूरा तना ढकि गयल हौ। मान्यता हौ कि इहां सिक्का लगउले से पुरखा लोग अपने जीवन में जवन कर्जा उधारी लेहले रहयलन, उ उतरि जाला, अउर ओकरे बाद ओन्हय बदे सरगे क दुआर खुलि जाला। हर साल भादव के पुन्नवासी से पितरपख शुरू होला अउर कुआर के अमौसा तक तक रहयला। सोलह दिना क इ पितरपख पुरखन के तर्पण-अर्पण बदे होला। कवनो मांगलिक काम एह दौरान नाहीं होत। मान्यता हौ कि पुरखा लोग पितरपख में धरती पर आइ के एह बाती क जांच करयलन कि जेकरे बदे उ जिनगी भर जीयल-मरल रहलन, ओकरे भीतर ओनकरे प्रति केतनी श्रद्धा बचल बा। यानी 16 दिना पितरन के प्रति श्रद्धा जतावय-बतावय क समय होला।

    एही बदे पितरपख के श्राद्ध पक्ष भी कहल जाला। पितरपख में अर्पण-तर्पण अउर पिंडदान कइले से पुरखा लोग प्रसन्न होइ के आशीर्वाद देलन। पितरन के आशीर्वाद से घर-परिवार में बरकत होला। एह साल पितरपख 20 सितंबर सोमवार से शुरू होइ के छह अक्टूबर तक रही। तर्पण-अर्पण अउर पिंडदान कहीं भी लोग करयलन, लेकिन सबसे पवित्र स्थान काशी क पिशाचमोचन अउर बिहार क गया मानल गयल हौ। पिशाचमोचन क अधिक महत्व एह कारण से हौ कि बिना इहां त्रिपिंडी श्राद्ध कइले गया गइले क फल नाहीं मिलत। पुरखन के मोक्ष नाहीं मिलत। जइसन कि आलेख में पहिलय लिखल हौ, त्रिपिंडी श्राद्ध खाली काशी में पिशाचमोचन तीर्थ पर ही होला। त्रिपिंडी बदे धरती पर दूसर जगह नाहीं हौ। काशीखंड में लिखल हौ कि पिशाचमोचन कुंड भगवान राम के धरती पर अवतार लेवय से पहिले क हौ। तब गंगा मइया भी धरती पर नाहीं आइल रहलिन। काशी में इ कुंड एतना पवित्र रहल कि ऋषि-मुनि अउर देवी-देवता तब एही में नहाय अउर एही ठिअन ध्यान-पूजा करय। ओह समय एकर नाव विलोमदत्त तीर्थ रहल। कुंड क नाव पिशाचमोचन पड़य के पीछे एक ठे कथा हौ। काशी में पिशाच नावे क एक ठे बाभन रहल। उ खाली दूसरे से दान लेय अउर खुद कभी भी दान-पुन्य न करय। उ लोगन से एतना दान लेइ लेहलस कि ओकर आत्मा भयानक रूप से अशांत होइ गइल। पिशाच बहुत परेशान रहय लगल। एक दिना वाल्मीकि ऋषि कुंड में नहाइ के एही पूजा करत रहलन। पिशाच वाल्मीकि जी के पास पहुंचल अउर अपने आत्मा के शांति बदे उपाय पुछलस। वाल्मीकि जी पिशाच के कुंड में नहाए बदे कहलन। लेकिन पिशाच जब कुंड में उतरल तब पानी ओहसे दूरे भागि गयल। उ जेतना आगे बढ़य, पानी ओतनय पीछे भागल जाय। परेशान होइ के पिशाच वापस वाल्मीकि जी के पास गयल। वाल्मीकि जी कहलन कि भाई इ तोहार समस्या हमरे बस क नाहीं हौ, एकरे बदे भगवान शिव या विष्णु क तपस्या करा। पिशाच तपस्या कइलस अउर भगवान शिव प्रकट भइलन। पिशाच जब ओन्हय आपन समस्या सुनइलस तब भोलेनाथ भी ओहके ओही कुंड में नहाए बदे कहलन। एदइया जब उ कुंड में उतरल तब पानी भागल नाहीं। कुंड के पानी में नहइले से पिशाच क आत्मा शांत होइ गयल। अब पिशाच भगवान शिव से वरदान मंगलस कि अशांत भटकय वाली कुल आत्मा के इहां अइसय शांति मिलि जाय। भगवान के आशीर्वाद से पिशाच ओही स्थापित होइ गयल। तबय से कुंड क नाव पिशाचमोचन पड़ि गयल। Source- https://hindi.news18.com/news/bhojpuri-news/mythological-story-of-kashi-know-interesting-facts-in-bhojpuri-3747873.html

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