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  • भोजपुरी कविता, कुबेरनाथ मिश्र 'विचित्र' के मुक्तक.: रउआँ अइतीं त अँगना अँजोर हो जाइत। हमार मन बाटे साँवर ऊ गोर हो जाइत। जवन छवले अन्हरिया के रतिया बाटे। तवन रउरी मुसुकइला से, भोर हो जाइत।। आप आते तो आंगन में प्रकाश हो जाता, मेरा मन जो सांवला पड़ गया है, वो भी गोरा हो जाता। काली-स्याह रात भी आपके मुस्कुराने से भोर में बदल जाती। जवना सरसों से भूतवा झराए के बा जवना सरसों से भूतवा झराए के बा। भूत ओही सरसउआ में घूसल बाटे। जवना नेता के दुखवा सुनावे के बा। लोग ओही के चमचा के चूसल बाटे।। जिस नेता का अपना दुख सुनाना है, लोग उसी की चमचागिरी में लगे हैं, जिससे प्रेत की झाड़-फूंक करवानी है, उसी के अंदर प्रेम समा गया है। Source- https://www.amarujala.com/kavya/kavya-charcha/bhojpuri-kavita-kubernath-mishra-vichitra-poem?page=2

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